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दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।।

दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।। हे पवन पुत्र आप संकट हरने वाले और मंगल करने वाले हैं। आपकी मूर्ति कल्याणकारी हैं। आप राम, लक्ष्मण, सीता सहित मेरे हृदय में निवास करो। हनुमान चालीसा की शुरुआत गोस्वामी "पवन कुमार" संबोधन से करते हैं और यहाँ समाप्ति में भी 'पवन तनय' कहते हैं। 'पवन तनय' नाम बहुत महत्त्वपूर्ण है। पवन अनेक प्रकार से बहता है। प्रभु के जन्म प्रसंग का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं। सीतल मंद सुरभि बड़ बाउ । हरषित सुर सन्तन्ह मन चाउ ।। अर्थात् शीतल, मंद, सुगंधित पवन बह रहा था। देवता ऐसे वातावरण से हर्ष अनुभव कर रहे थे और संतों के मन में प्रसन्नता छलक रही थी। चालीसा के आरम्भ में तुलसी जी बल बुद्धि और विद्या मांगते हैं। बल को नियंत्रण में रखे ऐसी बुद्धि और बुद्धि को नियंत्रण में रखे ऐसी विद्या ही जीवन को उर्ध्वगामी करती है। वे बल की सौम्यता, बुद्धि की शीतलता और विद्या की सुगंध प्राप्त करने के लिए ऐसे मंद मंद बहते हुए वायुदेव के पुत्र का स्मरण करते हैं। यहाँ चालीसा की समाप्ति में वे संकट हरन पवन तनय को या...

चौपाई जो यह पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा ।।३९॥

चौपाई जो यह पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा ।।३९॥ हनुमान चालीसा के पढने की कोई विधि नहीं है. नियम नहीं है। अखबार की तरह पढोगे तो भी बेडा पार हो जाएगा। इसका एक ही नियम है नित्य पाठ करो। और खंडित न हो यही निषेध है। इसके साक्षी स्वयं शंकर भगवान हैं। और उनके पास अनेक सिद्धियाँ हैं। अशोक वाटिका में माँ जानकी ने उनको आशीर्वाद दिया। सब देवता सब सुख नहीं दे सकते लेकिन हनुमान जी भौतिक आध्यात्मिक, लोक-परलोक, भोग और भगवान को भी प्राप्त करा सकते हैं। दुनियाँ में देव हजारों हैं, बजरंग बली का क्या कहना। इनकी भक्ति का क्या कहना, इनकी शक्ति का क्या कहना ।। ये सात समुन्दर लांघ गए, और गढ़ लंका में कूद गए। रावण को डराना क्या कहना, लंका को जलाना क्या कहना ।। जो प्रारब्ध में नहीं है या भाग्य में नहीं है वह भी हनुमान जी प्राप्त करा देते हैं। इसकी साक्षी भगवान शंकर दे रहे हैं। जो भाग्य में नहीं है और यदि गलत लिखा गया उसे भी मिटाना भगवान शंकर के ही बस की बात है। सब प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाले हैं वे भगवान को समुद्र के पार करवाया हमें भी भवसागर से पार करा देंगे। तुलसीदासजी यहाँ पाठ की फलश्र...

चौपाई तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महें डेरा ।। ४०।।

चौपाई तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महें डेरा ।। ४०।। कामना सिद्धि या इच्छा पूर्ति कोई नई समस्या पैदा कर सकती है। इसलिये तुलसी जी कामनाओं के स्थान पर हृदय में स्वयं हनुमान जी को ही आकर रहने को कह रहे हैं। जैसे कोई बड़ा आदमी अपने सेवक के घर करूणा या कृपा के कारण कभी उसके घर जाकर उसे कृतार्थ करता है, उसी तरह हे नाथ! आप भी मेरे हृदय में पधारो और मुझे कतार्थ करो। आप आगे इतना ही नहीं वहाँ अचल निवास करो 'डेरा डालो।' ऐसा देखने में आता है कि बहनें हनुमान जी के मंदिर में जाती है तब दोनों हाथ पीछे रखकर दूर से दर्शन करती हैं। हनुमान जी नैष्ठिक ब्रह्मचारी है इसलिये बहनें उनके चरणस्पर्श नहीं कर सकती। किसी भी देवी देवता का पूजन करना हो तब विवाहित स्त्री-पुरुषों को जोड़े से बैठना चाहिये परन्तु हनुमान जी की पूजा में पुरुष ही बैठ सकते हैं, स्त्रियाँ नहीं। हनुमान जी परम पवित्र देव हैं। उनकी नजर में स्त्री-पुरुष का भेद भाव नहीं किन्तु ऐसे जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी के प्रति आदर व्यक्त करने के लिए पुरुषों को भी स्नान किये बिना उनकी पूजा या स्पर्श नहीं करना चाहिये, ऐसा संत कहते हैं। बहनों को हाथ...

चौपाई- यह सत बार पाठ कर कोई। छूटै बंदि महसुख होई ।। ३८ ।।

चौपाई- यह सत बार पाठ कर कोई।            छूटै बंदि महसुख होई ।। ३८ ।। सत का एक अर्थ होता है सात, दूसरा अर्थ होता है एक सौ। बार अर्थात समय या वार (दिन)। हनुमान जी का दिन मंगलवार। (१) हमेशा सौ बार पाठ करना या सात बार पाठ करना। (२) हर मंगलवार को सौ बार पाठ करना। ऐसा करने से परमसुख की प्राप्ति होती है मनोविज्ञान कहता है कि विचारों या भावों को निष्ठा, आत्मबल और दृढ़ संकल्प से बार बार दोहराने पर उनके अनुसार फल निश्चित मिलता है। भवबंधन से मुक्ति चाहिये तो मृत्यु पर्यंत रोज हनुमान चालीसा का पाठ करने से शरीर छूटने पर मुक्ति मिलती है। एक संत कहते हैं हनुमान चालीसा का जो सौ बार पाठ करेगा। वह बंधन से छूट जाएगा। मुक्ति में आनन्द है, बन्धन में नहीं। बन्धन में सुरक्षा तो है पर स्वातंत्र्य नहीं। पिंजरे के पक्षी के पास आकाश नहीं। बन्धन बड़ा दुःख है और मुक्ति महा सुख। 'सा विद्या या विमुक्तये।' गुरु कृपा से ही मुक्त हुआ जा सकता है। "यह सत बार पाठ कर कोई"। 'कोई' कहा है। केवल पुरुष के लिए ही नहीं, स्त्रियाँ भी हनुमान चालीसा का पाठ कर सकती हैं। नारी तो क्या पशु पक्षियों का भी, जो...

चौपाई जय-जय-जय हनुमान गुसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नंहि ।। ३७ ।।

चौपाई जय-जय-जय हनुमान गुसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नंहि ।। ३७ ।। जय जय जय हनुमान गोसाई तीन बार जय शब्द दोहराया है। जय ध्वनि भक्त की भगवान के प्रति उत्कट भक्ति भावना का द्योतक है। संस्कृत में जयति और जयते शब्द प्रचलित हैं। हमारे राष्ट्र का प्रतीक वाक्य 'सत्यमेव जयते' में भी सत्य की ही जय ध्वनि है। सीतारामो जयति जयतु भारतम्, आदि। जयध्वनि हृदयोल्लास कारक, आत्म विश्वास वर्धक और उत्साहवर्धक होती है। युद्धकाल में भी जयध्वनि द्वारा वीरों का उत्साहवर्धन किया जाता है। जयशंकर, जय श्री राम, जय सियाराम, जय भवानी, जय महाकाल, जय हनुमान आदि जय ध्वनि सुनने को मिलती है। हनुमान चालीसा का शुभारंभ ही जय ध्वनि से हुआ है। 'जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।' समर्थ गुरु राम दास का जयघोष भी 'जय जय समर्थ रघुवीर' हनुमत भक्ति से ओत-प्रोत था। तुलसीदास जी हनुमानजी को गुरु रूप में मानते हैं अतः जयघोष करते हुए कहते हैं, "जय जय जय हनुमान गोसांई।" हनुमान चालीसा के प्रारंभ में दो बार और अन्त में तीन बार जय ध्वनि का गूढ़ भावार्थ है। तीन बार जयकार अर्थात् तीनों काल में हनु...

चौपाई संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ।। ३६।।

चौपाई संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ।। ३६।। हनुमान चालीसा या हनुमान अष्टक पढ़ने मात्र से ही संकट दूर हो जाते हैं। शनि के प्रकोप से बचाव के लिये हनुमान जी की भक्ति उत्तम है। संजीवनों लेने जब हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत से लौट रहे थे तो रावण ने उन्हें वहीं रोके रखने के लिए शनि को पीछे लगा दिया लेकिन हनुमान जी ने बुद्धि और बल से शनि को अपने पैरों के नीचे कुचलकर बांध दिया। शनि ने हार मानकर छोड़ देने की याचना की तब हनुमान जी ने कहा कि तुम इस शर्त पर बच सकते हो कि जब कोई व्यक्ति राम नाम का जय करे तो तुम उसे परेशान नहीं करोगे। यदि किसी बड़े आदमी के साथ अपना व्यक्तिगत संबंध हो तो उसके द्वारपाल हमें बाधा रूप बनने के बजाय  नमस्कार करके सीधे उस व्यक्ति को मिलने जाने देते हैं। इसी तरह हनुमान जी की सेवा से कोई बाधा या संकट हो तो वह कट जाता है। भाग्य के देव विधाता भी अड़चन पैदा नहीं करते। इसके पहले की चौपाई में तुलसीजी ने कहा "संकट ते हनुमान छुड़ावै" जब कि यहाँ कहते हैं "संकट कटै मिटे सब पीरा।"  हनुमान जी संकट से छुड़ाते है और हनुमान जी का स्मरण संकटों को काट देता ...

चौपाई और देवता चित्त न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई ।। ३५ ।।

चौपाई और देवता चित्त न धरई,            हनुमत सेई सर्व सुख करई ।। ३५ ।। जो भाग्य में नहीं है, प्रारब्ध में नहीं है। वह भी हनुमान जी प्राप्त करा देते हैं। हनुमान जी की सेवा और स्मरण से सब प्रकार के सुख मिलते हैं तो फिर दूसरे देवी-देवता को चित्त में स्थान देने की क्या जरूरत है। हनुमान जी में संपूर्ण आस्था रखने से, हृदय में उन्हें एक मात्र स्थान देने से सब सहज में प्राप्त होता है। भक्ति में अनन्यता जरूरी है। इन्द्र, वरूण, अग्नि, कुबेर ये सब देवता कहलाते हैं। जबकि शिवजी 'महादेव' कहलाते हैं। रूद्रावतार महावीर सर्व समर्थ हैं। कुबेर केवल धन के देवता हैं, वरूण जल के देवता है परन्तु भक्त की जो भी इच्छा हो महादेव उसे दे सकते हैं। इसलिये तुलसी जी कहते हैं जो भी चाहिए सुख-समृद्धि आदि वह हनुमान जी की सेवा करके प्राप्त करो। अनन्यता से सिद्धि अनायास मिलती है। रामचरित मानस में कहा है - सो अनन्य जाके असि मति न टरे हनुमंत।  मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत ।। अनन्यता दूसरों की अवगणना करने को नहीं कहती। अन्य देवी-देवताओं के साथ कैसे व्यवहार करना, सीखना चाहिये। मछली की अनन...

चौपाई अंतकाल रघुवर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ।। ३४।।

चौपाई अंतकाल रघुवर पुर जाई ।          जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ।। ३४।। प्रभु राम का भक्त अंतकाल में उनके धाम में जाता है इसी को मुक्ति या मोक्ष कहते हैं।  इसका दूसरा अर्थ है अंतकाल अर्थात् अंतिम समय में, जीवन के संध्याकाल में वृद्धावस्था में मरणासन्न व्यक्ति रघुवरपुर में अयोध्या में वास करे तो उसका दूसरा जन्म अवध में होता है और आयोध्यावास सहजरूप से व्यक्ति को रामभक्त बना देता है। हनुमान जी की कृपा का चमत्कार साधक को अंतिम दिनों में अयोध्या जाकर रहने की प्रेरणा देता है। रघुवरपुर अर्थात साकेत। साकेत में सब ऐसे भक्त का हनुमान जी के (हरि का एक अर्थ 'वानर' होता है) भक्त की तरह आदर करते हैं। मुक्ति में प्रभु मिलन का आनंद होता है और जीवन मुक्त दशा में प्रभु कार्य का आनंद मिलता है और संसार में ऐसे व्यक्ति प्रभु के जन (भक्त) कहलाते हैं जिसने हनुमान जी की भक्ति की, सेवा की, उपासना की वह अंत में साकेत धाम यानि वैकुंठ को प्राप्त होता है। वैकुंठ यानि जहाँ कोई कुंठ नहीं, दुःख नहीं। आनंद ही आनंद है। अद्वैत में गए तो मुक्ति, द्वैत में आ गए तो भक्ति। मुक्ति में अस्तित्व की अ...

चौपाई- तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुःख बिसरावै ।।३३ ।।

चौपाई- तुम्हरे भजन राम को पावै,            जनम जनम के दुःख बिसरावै ।।३३ ।। हनुमानजी का भजन करने वाले को प्रभु राम की प्राप्ति होती है और जन्म जन्मांतरों के दुःख दूर हो जाते हैं। दुःखों का विस्मरण हो जाता है। सामान्य तौर पर जगत में संतान की प्रशंसा करने पर उसके माता-पिता खुश होते हैं। श्री हनुमान जी श्री राम और माता जानकी के पुत्र समान है अतः तुलसी जी कहते हैं जब हम हनुमान जी के चरित्र का गान करते हैं तो स्वाभाविक रूप से राम जी प्रसन्न होते हैं। हनुमान जी के भक्त के हृदय में वे प्रकट हो जाते हैं। "पावै" के संतो ने दो अर्थ बताएं हैं? (1) हनुमान जी का भजन करने वाले को राम जी मिलेंगे। (2) आपकी तरह आपकी रीति से जो राम जी का भजन करेगा उसे राम मिलेंगे। भजन के पीछे चार प्रेरक बल होते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। जो सकाम भाव से भजन करते हैं उनकी कामना तो पूरी हो जाती है परन्तु उसको भगवान की प्राप्ति नहीं होती। जो भक्त हनुमान जी की तरह निष्काम भाव से आपकी रीति से भजन सेवा करता है उसे श्रीराम की प्राप्ति होती है। निष्काम भाव अर्थात् किसी भी प्रकार की लौकिक या पारलौक...

चौपाई राम रसायन तुम्हरे पासा । सादर हो रघुपति के दासा

चौपाई राम रसायन तुम्हरे पासा ।           सादर हो रघुपति के दासा।। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार यदि किसी औषधि को खूब असरकारक बनानी हो तो उसे अलग अलग रस की भावना देकर सिद्ध किया जाता है। इस प्रकार तैयार की हई औषधि रसायन कहलाती है। ऐसे रसायन असाध्य रोगों को दूर कर देते हैं और वृद्धावस्था को दूर रखते हैं। धर्म शास्त्र परमात्मा को "रसो वै सः" कहते हैं। प्रभु स्वयं रस स्वरूप हैं। रसायन अर्थात रस के भंडार। राम रूप रसायन हनुमान जी के पास हमेशा रहता हैं। जिससे हनुमान जी भक्तों के सांसारिक शारीरिक और मानसिक रोग दोष दूर करें। कारण वे आदर सहित राम रूप पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर की सेवा में दास रूप में रहते हैं। कथा बुद्धि और चरित्र की खुराक है। हनुमान जी सदा राम कथा सुनते। कथा से ईश्वर के ऐश्वर्य और महिमा का ज्ञान होता है और प्रभु पर भरोसा दृढ़ होता है। हनुमान जी भगवान नाम संकीर्तन में मगन रहते हैं, इसलिये वे 'रघुपति प्रिय भक्त ' हैं। नाम स्मरण मन को शांत, प्रसन्न और पुष्ट करता है। माता जब लोरी सुनाती है रोता हुआ बालक शांत हो जाता है उसी तरह संकीर्तन में मन सहज रूप से शांत हो...

चौपाई आष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता ।। ३१।।

चौपाई आष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता,           अस बर दीन जानकी माता ।। ३१।। जानकीजी ने हनुमानजी को आठों सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान दिया था। आठ सिद्धियाँ हैं : (1) अणिमा - शरीर को सूक्ष्म करना, अति कठिन पदार्थों में भी प्रवेश करना। वामन मांगते समय छोटे और मापते समय विराट हो गए। (2) महिमा = वृहद रूप करना। (3) गरिमा = शरीर को लौह समान बनाना, चाहे जितना वजनदार बनाना। जैसे रावण के दरबार में अंगद का पैर। (4) लघिमा = स्वयं को भारहीन कर लेना। हल्का-फुल्का। (5) प्राप्ति - अलभ्य वस्तु की उपलब्धि इच्छित पदार्थ की प्राप्ति। प्राप्त करने जाना नहीं पड़ता। जैसे समुद्र नदियाँ ढूंढने नहीं जाता, नदियाँ उसमें आती हैं। (6) प्राकाम्य - लक्ष्यपूर्ति। पृथ्वी में भी समा सकना, आकाश में भी उड़ सकना। (7) ईशित्व = पदार्थों की उत्पत्ति, विनाश क्षमता। शासन करने का सामर्थ्य। जैसे विश्वामित्र ने त्रिशंकु को, स्वर्ग भेजा। नारियल विश्वामित्र का अधूरा नर है। ईशित्व, यानि शासन करने की क्षमता। दबाव में किसी को पकड़ नहीं सकते। शासन प्रेम का ही होना चाहिये। दमन पत्नी पर भी नहीं कर सकते। शरीर...

चौपाई चारों युग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा ।। २९।। साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ।। ३० ।।

चौपाई चारों युग परताप तुम्हारा।           है परसिद्ध जगत उजियारा ।। २९।।           साधु संत के तुम रखवारे ।           असुर निकंदन राम दुलारे ।। ३० ।। धर्म ग्रंथों के अनुसार संपूर्ण जगत में बारंबार चार युगों का आगमन होता रहता है। ये चार युग हैं- सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग।  हनुमानजी सत्य युग में शिवस्वरू में विराजते हैं।  त्रेतायुग में हनुमान वानर- रूप में रहते हैं।  द्वापर में अर्जुन के रथ को ध्वजा में रहे हैं और  कलियुग में पवन रूप में प्राणतत्व के रूप में रहकर सबकी रक्षा करते हैं।  काल की कसौटी पर हनुमानजी खरे उतरे हैं। चारों युगों में हनुमानजी का प्रताप है। हनुमानजी को काल का बंधन नहीं। जन्म के समय उन्हें मिले हुए वरदान के कारण यमराज या काल का प्रभाव उन्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता। कलियुग में जहाँ-जहाँ भगवान राम की कथा होती है वहाँ किसी न किसी रूप में वे आकर का श्रवण करते हैं। प्रभुराम का जब साकेत धाम जाने का समय हुआ तो उन्होंने हनुमानजी को बुलाकर कहा, "आप दिव्य रूप ...

चौपाई और मनोरथ जो कोई लावे, सोई अमित जीवन फल पावे ।। २८ ।।

चौपाई और मनोरथ जो कोई लावे,           सोई अमित जीवन फल पावे ।। २८ ।। लोग हनुमानजी के पास धन प्राप्ति, पुत्र कामना, शत्रु विजय आदि इच्छाएँ लेकर जाते हैं ये सब ईच्छाएँ कामनाएँ कहलाती हैं। हनुमानजी अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं। वैष्णव संप्रदाय का एक उत्तम शब्द है "मनोरथ"। सांसारिक इच्छा 'कामना' कहलाती है जबकि प्रभु के लिये किया गया कोई भी कार्य, या भावना या प्रभुप्राप्ति की आतुरता "मनोरथ" कहलाती है। "और मनोरथ" यानि साधक यदि भक्त की या राम-प्राप्ति की भावना करे तो हनुमानजी उसे 'अमित जीवन फल' देते हैं। रामचरित मानस में जीवन का फल इस प्रकार कहा है : सब साधन कर सफल सुहावा ।  राम लखन सिय दर्शन पावा ।।  जहँ लगी साधन वेद बखानी।  सब कर फल हरि भगति भवानी ।। रामदर्शन और रामभक्ति में ही जीवन की सफलता है। हनुमानजी ने गोस्वामीजी को यह फल प्रदान किया। इस रामफल का रस, भक्ति का रस अमित है। यह जन्म जन्मांतरों में भी नहीं सूखता। एक संत कहते हैं, जो भी ईच्छा हनुमानजी के पास लेकर जाएंगे वह तो पूरी होती ही है पर उससे अमित ज्यादा ही मिल जाता है अर्थात जिस...

चौपाई सब पर राम राय सिर राजा। तिनके काज सकल तुम साजा ।। २७।।

चौपाई सब पर राम राय सिर राजा।          तिनके काज सकल तुम साजा ।। २७।। सब पर" का अर्थ है "सभी के ऊपर", "राम" का अर्थ है भगवान राम, "राय" का अर्थ है राजा, और "सिर ताजा" का अर्थ है "मुकुट" या "सिर का गहना"। इसलिए, यह चौपाई बताती है कि श्रीराम सभी के ऊपर हैं, राजाओं के मुकुट के समान। तिन" का अर्थ है "उनका", "काज" का अर्थ है "कार्य", "सकल" का अर्थ है "सारे", और "तुम साजा" का अर्थ है "तुमने सजाया" या "तुमने किया"। इसलिए, यह चौपाई बताती है कि हनुमान जी ने श्रीराम के सभी कार्यों को भी पूरा किया है।   प्रभु राम परात्पर ब्रह्म हैं। भगवान राम को चौदह वर्ष का वनवास होने पर वे माता कौशल्या से कहते हैं: पिता दीन्ह मोहि कानन राजू।  जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू ।। वन में ऋषिमुनियों की विनती पर राक्षसों का संहार करके उनके संकट "कानन राजा" बनकर दूर किये। रावण जैसे असुरों का नाश किया। इस विकट कार्य को संपन्न करने में हनुमान जी प्रभु की पूरी सहायता कर...

चौपाई संकट ते हनुमान छुड़ावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ।।२६ ।।

चौपाई संकट ते हनुमान छुड़ावै ।            मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ।।२६ ।। भक्त कवि तुलसीदास जी सभी हनुमत भक्तों को दृढ विश्वास दिलाते हैं कि हनुमानजी की कृपा से सब संकटों का निवारण हो जाता है। जो व्यक्ति मनसा वाचा, कर्मणा अर्थात अंतर्मन से, वाणी से और अपने कर्म द्वारा हनुमान जी का ध्यान करता है, उसकी हनुमानजी सभी प्रकार के कष्टों से रक्षा करते हैं। कष्टों का, संकटों का, विपदाओं का निवारण कर देते हैं। हनुमानजी ने भगवान श्रीराम के संकटों का अनेक बार निवारण किया। लक्ष्मण, भरत, जानकीजी, सुग्रीव, जाम्बवन्त, अंगद, विभीषण आदि के भी संकटों को मिटाया वे अंजनानन्दन हमारे संकट तो सहज ही दूर करने में सक्षम हैं। इसीलिये भक्तगण उन्हें "संकटमोचन" के नाम से पुकारते हैं। " संकट मोचन कृपा निधान, रक्षा कीजै श्री हनुमान।" तुलसीदासजी ने तो अलग से "संकटमोचन हनुमानाष्टक" की रचना कर दी। " को नहीं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो।" हनुमान जी संकट निवारण किनके करते हैं? "मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।" जो उनका मन, वचन और कर्म से ध्यान करता है। अति संकट होन...

चौपाई नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा ।। २५ ।।

चौपाई नासै रोग हरै सब पीरा।            जपत निरंतर हनुमत बीरा ।। २५ ।। श्री हनुमानजी के नाम का निरंतर जप करने से रोग भाग जाते हैं और पीड़ा का हरण हो जाता है। रोग दो प्रकार के हैं। (अ) शारीरिक रोग जैसे कैंसर, बुखार, हृदय रोग, पक्षाघात आदि। (ब) मानसिक रोग जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ममता आदि। ये मनुष्य को अंदर से हताश-निराश कर पंगू कर देते हैं। "नारद पुराण" में असाध्य और भयंकर रोगों के निवारणार्थ हनुमानजी के नाम और मंत्रों की अनुष्ठान विधि बताई है. पस्तु यदि केवल - संकट मोचन कृपा निधान, रक्षा कीजै श्री हनुमान। इसका श्रद्धापूर्वक जप करने पर किसी भी प्रकार का रोग या भूत-प्रेत का कष्ट निवारण हो जाता है। जप निरंतर होना चाहिये। जप में एकाग्रता होनी चाहिये। मुनि पतंजलि 'पातंजल योग सूत्र' के पहले अध्याय के २८ वें सूत्र में कहते हैं: "तज्जपस्तदर्थ भावनम्" अर्थात् जप का अर्थ और भाव समझकर ध्यानपूर्वक जप करना चाहिये। इससे उसका फल जल्दी मिलता है। हनुमानजी सत्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ और कर्त्तव्यनिष्ठ हैं। उनके उपासक को अपना जीवन भी इसी प्रकार का बनाना चाहिये। रोग मानसिक होते हैं,...

चौपाई भूत पिशाच निकट नहीं आवै। महावीर जब नाम सुनावै ।। २

चौपाई भूत पिशाच निकट नहीं आवै।            महावीर जब नाम सुनावै ।। २ महावीर श्री हनुमानजी का नाम कोई बोलो तो वह सुनकर जो भूत-अनिष्ट तत्त्व हैं , वे नाम जपने वाले के नजदीक नहीं आते। भूत पिशाच जैसी भटकती आत्माओं को दूर रखने, किसी की बुरी नजर से बचाने या नजर उतारने के हनुमानजी का नाम, भक्तों के लिए बहुत माहात्म्य का है। मनुष्य स्वयं पंच महाभूतों से बना हुआ। फिर उसे एक भूत से क्या डरना। कमजोर मन वाले को भूत प्रेत तकलीफ देते महावीर श्री हनुमानजी का नाम स्मरण करते ही मनुष्य का मनोबल बढ़ जाता है दृढ़ मनोबल वाले व्यक्ति के पास भूत पिशाच का विचार भी नहीं आता।" हनुमानजी बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं और जहाँ श्रेष्ठ बुद्धि का शासन होता है वहां जड़ता, अंधश्रद्धा, शंका के भूत का टिकना मुश्किल होता है। व्यावहारिक जगत में देखें तो सत्ता का हर पद 'भूतपूर्व' हो जाता है। सत्ताधीश व्यक्ति के पास से पद चला जावे पर वह 'भूतपूर्व मंत्री', 'भूतपूर्व राष्ट्रपति' के नाम से जान जाता है। भूत सेवक हनुमानजी के पास नहीं आ सकता तो फिर पद कैसे आएगा? प्रभुराम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राजपद द...

चौपाई आपन तेज सम्हारो आपै, तीनो लोक हाँक ते कांपै ।। २३॥

चौपाई आपन तेज सम्हारो आपै,            तीनो लोक हाँक ते कांपै ।। २३॥ हनुमानजी का तेज, पराक्रम और बल जब बढ़ने लगता है तब किसी में भी ऐसा सामर्थ्य नहीं कि उन्हें रोक सके, कारण वे स्वयं शंकरजी हैं। प्रलय करने की भी उनमें शक्ति है। लक्ष्मणजी को जब शक्ति लग जाती है और मूर्छित हो जाते हैं तब राम विलाप करने लगते हैं तब हनुमानजी प्रभुराम को कहते हैं "हे भगवन् यदि आप आज्ञा दें तो लक्ष्मणजी की मूर्छा उतारने के लिए मैं चन्द्रमा को निचोडकर उसका अमृत उपस्थित कर दूँ। आप आज्ञा करें तो पाताल में जाकर सर्पों के बीच रहे हुए अमृत कुंड को उठा लाऊँ। आप कहें तो स्वर्ग के वैद्यराज को आपके सामने ले आऊँ आदि।" और अंत में अपने तेज, पराक्रम और शौर्य को संभालते हुए कहते हैं कि एक पल के भी विलंब बिना आपको जो अच्छी लगे वह आज्ञा दीजिए, आपकी कृपा से, प्रताप से, बल से मैं उसका पालन करूँगा। जो अपना तेज संभाल सकता है वही दूसरे की तेजस्विता की कदर कर सकता है। निस्तेज हमेशा तेजोद्वेषी होता है। जिसे स्वाभिमान की परवाह नहीं ऐसे लोग दूसरों का अपमान करते हैं। ऐसे तेज निधान हनुमानजी जब रावण की सभा मे...

चौपाई- सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना ।। २२।।

चौपाई- सब सुख लहै तुम्हारी सरना।             तुम रक्षक काहू को डरना ।। २२।। जगत में सुख के दो प्रकार हैं- भौतिक साधनों से प्राप्त होने वाला सुख जैसे -गाड़ी, बंगला, फर्नीचर, प्रोपर्टी, स्वस्थ और बलवान शरीर आदि से दूसरा अनुभूति जैसे- भावना प्रधान स्वभाव, नम्रता, क्षमा, विनय, विवेक, सहृदयता, कुशाग्र बुद्धि से मिलने वाला सुख। श्री हनुमानजी की शरण जाने से सांसारिक सुख तो मिलता ही है और राम भक्ति का वरदान भी मिलता है जिससे निष्काम भक्ति करते-करते मोक्ष का अधिकारी बना जा सकता है।" सब सुख लहै तुम्हारी सरना" का एक दूसरा अर्थ है, "जगत के तमाम सुख हनुमानजी की शरण में रहते हैं और सदा हनुमानजी की आज्ञा की प्रतीक्षा में होते हैं। हनुमानजी के आदेश देने पर वे सुख उस भक्त के पास जाते हैं। जिसके रक्षक हनुमानजी हों, वह संसार में किसी से नहीं डरता। सब देवी देवता भी समझ जाते हैं कि इस साधक ने हनुमानजी की शरण स्वीकारी है, अतः उसे कष्ट देंगे तो अपनी तकलीफ का पार नहीं। इसलिये शनिदेव, यमराज, दुर्भाग्य आदि पास भी नहीं आते। एक संत कहते हैं, सबको सुखी करना मुश्किल है। एक का सुख द...

चौपाई राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।। २१ ।।

चौपाई राम दुआरे तुम रखवारे ।            होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।। २१ ।। भगवान राम का धाम साकेत है। हनुमानजी सदैव एक रूप में वहाँ रहकर द्वारपाल का कार्य करते हैं। भक्तों का कोई महत्त्वपूर्ण कार्य हो तब हनुमानजी अन्दर जाकर यह समाचार देते हैं तब ही दरबार में प्रवेश मिलता है। व्यावहारिक जीवन में भी जब बहुत बड़े व्यक्ति को मिलना हो तो उसके घर का ऑफिस में पहले (वाचमेन) द्वार पाल को विजिटिंग कार्ड या संदेश देना होता है। और वह मालिक की अनुमति लेकर फिर प्रवेश देता है। भक्तों का खयाल प्रभु राम रखते हैं और हनुमानजी रामजी का खयाल रखते हैं। विश्व में जहाँ भी राम मंदिर होता है वहाँ हनुमानजी की मूर्ति होगी ही। हनुमानजी बिना श्री राम अधूरे हैं और हनुमानजी के हृदय में श्रीराम लखन जानकी जी होते ही हैं। इसलिये यदि अकेले हनुमानजी ही मंदिर में हों तो उनके पूजन से सबका पूजन हो जाता है। हनुमानजी सदैव राम सेवा में तत्पर रहते है। यदि भक्त राम मंदिर में कोई इच्छा लेकर जाता है तो दरवाजे पर प्रहरी की तरह हनुमानजी उनकी इच्छा पूरी कर देते हैं जिससे प्रभुराम तक भक्तों की मांग न पहुँचे औ...

चौपाई दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ २०॥

चौपाई दुर्गम काज जगत के जेते,            सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ २०॥ यह संसार अति दुर्गम है। जीवन में कठिनाईयाँ आती है तब यदि हनुमानजे की प्रार्थना करके उनका अनुग्रह प्राप्त होने पर वे कार्य सुगमता से हो जाते हैं। हनुमानजी बड़े सरल हैं और भक्तों पर पल भर में प्रसन्न हो जाते हैं। श्री रणछोड़दासजी महाराज कहते हैं "मनुष्य यत्न और ईश्वर कृपा" अपनी शक्ति और मति अनुसार पूरा प्रयत्न करके नम्रतापूर्वक हृदय से प्रार्थना करो कि मैंने अपनी ओर से कार्य किया अब आप कृपा करके मुझे सफलता दो। ऐसा करने वाला उद्यमी मानव विजयी बनाता है। भगवान पर भरोसा रखो, भगवान पूर्ण करेंगे, हम सब निमित्त हैं। इस आचरण से जीवन में विवेक दृष्टि आती है। प्रभुराम स्वयं सुग्रीव को कहते हैं- सखा सोच त्यागहू बल मोरे। सब विधि घटब काज मैं तोरे ।। भगवान का अनुग्रह होने पर शक्ति बढ़ जाती है।

चौपाई प्रभु मुद्रिका मेलि मुख महिं, जलधि लाँघि गए अवाज नाहिं ।। २८ ।।

चौपाई प्रभु मुद्रिका मेलि मुख महिं,          जलधि लाँघि गए अवाज नाहिं ।। २८ ।। राम तो वनवासी, वल्कल वेशधारी थे, उस समय उनके पास मुद्रिका कहाँ से आई? जब केवट ने गंगापार कराई तब भगवान को केवट को उतराई देने का विचार आया तो तुरंत सीता जी ने अपनी मुद्रिका उतारकर श्री राम के हाथ में रख दी। केवट ने उतराई नहीं ली और तब से वह मुद्रिका श्री राम के पास थी। सीताजी हनुमान जी को पहचान सके इसलिए श्री राम वह मुद्रिका हनुमान जी को देते हैं। जब हनुमान जी मुद्रिका सीताजी को देते हैं तो सीताजी प्रसन्न होकर पूछती हैं, बेटा! इतना विशाल समुद्र तूने पार कैसे किया? श्री हनुमान जी ने नम्रतापूर्वक कहा कि इस मुद्रिका में राम नाम अंकित है। इस रामनाम के प्रताप से उड़कर में लंका पहुँच गया। रामनाम की महिमा कौन नहीं जानता? रामचरित मानस में कहा है :- नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं, करहु विचार सुजन मन माहिं ।। राम नाम भव सागर को भी सुखा देने में समर्थ है तो यहाँ तो केवल सागर ही तो पार करना था। 1. हनुमान जी ने मुद्रिका को मुँह में रखी। कथाकार विनोद में कहते हैं कि हनुमान जी ने वानर देह धारण किया है इसल...

चौपाई जुग सहस्त्र जोजन पर भानु, लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।। १८ ।।

चौपाई जुग सहस्त्र जोजन पर भानु,            लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।। १८ ।। सूर्य पृथ्वी से करोडों मील दूर है। वैज्ञानिकों के अनुसार सात करोड़ बत्तीस लाख मील दूर है और सूर्य बिम्ब सोलह हजार मील के घेरे में फैला हुआ है। जन्म होते ही हनुमान जी को खूब भूख लगी। ऊपर नजर की तो आकाश में लाल रंग के सूर्य देव उदय हो रहे थे। उनको फल मानकर गर्जना की और ऊपर उड़ने लगे। सूर्य के पास पहुँचे तब राहू सूर्य को ग्रस रहा था (सूर्य ग्रहण था) हनुमान जी ने अपनी पूंछ फटकारी तो वह भयभीत होकर मूर्छित हो गया। हनुमान जी ने सूर्य को हाथ में पकड़ लिया और अपना मुहँ सूर्य से भी बड़ा करके मुहँ में रख लिया। हनुमान जी को ख्याल आया कि यह कोई फल नहीं है तो उसे छोड़ दिया और उससे खेलने लगे। राहू मूर्छा उतरने पर इन्द्र की शरण गया और सब हकीकत बताई। हाथ में वज्र लेकर देव सेना के साथ इन्द्र हनुमान जी के पास पहुँच गए। लड़ाई शुरु हुई देव सैन्य को हनुमान जी ने हरा दिया इसलिए इन्द्र ने बाल हनुमान के जबड़े पर वज्र प्रहार किया इससे वे बेहोश हो गए। पवन देव इन्द्र पर बहुत कोपायमान हुए और हनुमान जी को गोद म...

चौपाई - तुम्हारो मंत्र विभीषण माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना ।। १७।।

चौपाई - तुम्हारो मंत्र विभीषण माना,              लंकेश्वर भए सब जग जाना ।। १७।।  विभीषण जीव का प्रतिनिधित्व करते हैं। साधक जीव है। लंका में रहते हैं। लंका भोग नगरी है। ऐसी नगरी में रहने के बाद और रावण के भाई होने पर भी राम नाम जपते है। उन्हें प्रारम्भ से ही ईश्वर के प्रति लगाव है। विभीषण ने अपने घर के बाहर राम नाम लिखने के बजाय तीर बाण का चित्र बना दिया ताकि रावण को न लगे कि दुश्मन का नाम लिखा है बल्कि वीर का नाम है। अध्यात्म शास्त्र की दृष्टि से रावण मोह का प्रतीक है। विभीषण रामनाम जपता है, साधना भी करता है पर भगवान के आधीन रहने के बजाय रावण के आधीन रहता है। जीवन की यही सबसे बड़ी समस्या है कि आस्तिक होने के बाद भी दुर्गुणों के मनमाने साम्राज्य को भी स्वीकार करता है। भक्ति रूपा जानकी जी लंका की अशोक वाटिका में होने के बाद भी अनेक दर्शन करने नहीं जाते और प्रभु को उपयोगी हो, प्रभु प्रसन्न हो ऐसा कोई रामकार्य भी नहीं करते विभीषण। जब लंका में हनुमान जी से विभीषण की भेंट हुई तौ विभीषण स्वयं की कथा कहते हैं, "मेरा तामसी प्रकृति वाला शरीर है, राक्षस कुल ...

चौपाई - तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा ।। १६ ।।

चौपाई - तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा,              राम मिलाय राजपद दीन्हा ।। १६ ।। हनुमान जी ने ही सुग्रीव को राम से मिलाकर राजा बनाया। "राजते इति राजा" राजा बनना जिम्मेदारी का विषय है। सत्ता भोग के लिए नहीं सेवा के लिए मिलती है। राजा से समाज की शोभा बढ़ती है। सुग्रीव की खूब सहायता की। उस पर उपकार किया है। किसी को भगवान से मिला देने से बड़ा कोई उपकार नहीं। रामचरित मानस के अनुसार जीव की तीन कक्षाएँ हैं :- 1. विषयी - वे जीव जो न तो भव पार उतरे हैं और न ही भव पार जाने की इच्छा रखते हैं। सुग्रीव इस कक्षा में आते हैं। वे भोगवादी विचारधारा वाले जीव हैं। 12. साधक - ऐसे जीव भवपार जाना चाहते हैं लेकिन किनारे पर खड़े होकर नौका की प्रतीक्षा करते हैं। विभीषण इस कक्षा (साधक अवस्था) में जीते हैं। भवपार जाने के लिए सद्‌गुरु की उनके जीवन में कमी है। 3. सिद्ध - ऐसे बड़भागी संत जो नाव में बैठकर भवपार हो गए हैं। संत भरत की गणना इस कक्षा में होती है। सुग्रीव के जीवन में प्रभुप्राप्ति कर सकें, जैसा एक भी गुण नहीं दिखता। भाई के साथ झगड़ा होने पर भागकर ऋष्यमूक पर्वत पर आश्रय ...

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद सारद सहित अहीसा ।। १४।।यम कुबेर दिग्पाल जहाँ ते, कवि कोविद कहि सके कहाँ ते ।।१५।।

चौपाई सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद सारद सहित अहीसा ।। १४।। यम कुबेर दिग्पाल जहाँ ते, कवि कोविद कहि सके कहाँ ते ।। १५।। सनकादि ऋषि मुनि स्वयं ब्रह्मा, महर्षि नारद, माँ सरस्वती भी तुम्हारे यशोगान का गुण का, शौर्य प्रताप का वर्णन नहीं कर सकते वहाँ पृथ्वी लोक के कवि, पंडितो या विद्वानों की क्या हैसियत है। यमराज, कुबेर दिशाओं के दिग्पाल आदि समस्त देवता आपके यश का पूरा पूरा वर्णन नहीं कर सकते तो फिर पृथ्वी पर रहने वाले कवि या विद्वान आपके यश का गान कैसे कर सकते हैं? कवि वह है जो क्रान्तदर्शी है और कोविद अर्थात् ज्ञानी कवि। जो हनुमान जी की उपासना करते हैं उन्हें उपरोक्त सब देवता आशीर्वाद देते हैं। हम हमेशा मंदिर जाते हैं। कभी न जा पाएँ तो भगवान बैचेन होते हैं कि वह क्यों नहीं आया। यह स्थिति हनुमान जी की है।

सहस बदन तुम्हारो जस गावै, अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ।। १३ ।।

चौपाईं - सहस बदन तुम्हारो जस गावै,             अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ।। १३ ।। हजार मुँह तुम्हारा यश गाएं ऐसा कहकर प्रभु राम ने आपको गले लगाया है। स्वयं भगवान जिसे अपना मानकर गले लगावें और प्रेम करें उनकी महिमा का गान सब करते हैं। यशगान करने या कहने के लिये आवाज की जरूरत होती है और स्वर गले में होता है। प्रभु हनुमान जी को गले लगाकर मानों संकेत करते हैं कि इस गले की मर्यादा है, आवो तुम्हें यही रख लेता हूँ। याद आते ही, आंखों और हृदय में भाव में उफान आता है। शब्दों की जब सीमा आ जाती है तब स्पर्श को एक भाषा बनाकर जो कहना होता है वह आसानी से कहा या समझाया जा सकता है। यहां प्रभु राम भी कृपा पूर्ण दृष्टि और प्रेम पूर्ण स्पर्श की भाषा का प्रयोग करते हैं। लोग हमें बाहर से और भगवान हमें भीतर से जानते हैं। परमात्मा जिसके हो गए, सारी दुनियाँ उसकी हो जाती है। परमात्मा बिंब है दुनियां प्रतिबिंब है। प्रभु प्रीति अमर है लोक प्रीति चंचल है। भगवान (श्रीपति) बार बार हनुमान जी को गले लगा रहे हैं।

चौपाई - लाय संजीवन लखन जियाये। श्री रघुवीर हरषि उर लाए ।।११।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरत सम भाई ।। १२ ।।

चौपाई - लाय संजीवन लखन जियाये।             श्री रघुवीर हरषि उर लाए ।।११।।            रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।             तुम मम प्रिय भरत सम भाई ।। १२ ।। लक्ष्मण जी साक्षात शेषावतार हैं, उन्हें कोई मार नहीं सकता। परन्तु ब्रह्मशक्ति को ब्रह्माजी ने वरदान दिया था कि वह जिसे लगेगी वह मर जाएगा। मेघनाद ने इस शक्ति का लक्ष्मण जी पर वार किया तो वरदान की महिमा रखने के लिए लक्ष्मण जी मृत जैसे बन गए। दूसरी ओर हिमालय पर उगी हुई संजीवनी बूटी को भी वरदान था कि उसका उपयोग करने पर मृतप्राय व्यक्ति भी पुनर्जीवित हो जाएगा। लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर राम विलाप करने लगे। हनुमान जी सुषेन वैद्य को लेने गये। यह उनकी दूसरी VISIT थी लंका की। सुषेण को उपस्थित किया, उसने कहा द्रोणागिरी पर्वत पर संजीवनी बूटी यदि प्रातःकाल के पहले लाई जा सके तो लखन जी के प्राण बच सकते हैं। हनुमान जी ने सोचा लखन जी को कुछ हो गया तो राम जी प्राण छोड़ देंगे। संजीवनी लेने जाते समय हनुमान जी बोले, "भगवान चिन्ता नहीं करना, मैं सूर्यो...