चौपाई - तुम्हारो मंत्र विभीषण माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना ।। १७।।
चौपाई - तुम्हारो मंत्र विभीषण माना,
लंकेश्वर भए सब जग जाना ।। १७।।
विभीषण जीव का प्रतिनिधित्व करते हैं। साधक जीव है। लंका में रहते हैं।
लंका भोग नगरी है। ऐसी नगरी में रहने के बाद और रावण के भाई होने पर भी राम नाम जपते है। उन्हें प्रारम्भ से ही ईश्वर के प्रति लगाव है। विभीषण ने अपने घर के बाहर राम नाम लिखने के बजाय तीर बाण का चित्र बना दिया ताकि रावण को न लगे कि दुश्मन का नाम लिखा है बल्कि वीर का नाम है। अध्यात्म शास्त्र की दृष्टि से रावण मोह का प्रतीक है। विभीषण रामनाम जपता है, साधना भी करता है पर भगवान के आधीन रहने के बजाय रावण के आधीन रहता है। जीवन की यही सबसे बड़ी समस्या है कि आस्तिक होने के बाद भी दुर्गुणों के मनमाने साम्राज्य को भी स्वीकार करता है। भक्ति रूपा जानकी जी लंका की अशोक वाटिका में होने के बाद भी अनेक दर्शन करने नहीं जाते और प्रभु को उपयोगी हो, प्रभु प्रसन्न हो ऐसा कोई रामकार्य भी नहीं करते विभीषण।
जब लंका में हनुमान जी से विभीषण की भेंट हुई तौ विभीषण स्वयं की कथा कहते हैं, "मेरा तामसी प्रकृति वाला शरीर है, राक्षस कुल में जन्म हुआ है, प्रभु प्राप्ति की कोई साधना मैं नहीं जानता।" हनुमान जी कहते हैं -प्राप्ति की कोई साधना मैं नहीं जानता।" हनुमान जी कहते हैं-
सुनहु विभीषण प्रभु के रीति। करहिं सदा सेवक पर प्रीति ।।
जब मेघनाद ने हनुमान जी को रावण की सभा में उपस्थित किया तो हनुमान जी रूद्रावतार होने के नाते रावण के गुरु हैं। तारक यंत्र हमेशा गुरु देता है। गुरु मंत्र देते हुए हनुमान जी रावण को कहते हैं :
रामचरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम करहू ।।
परन्तु विभीषण के अतिरिक्त इस मंत्र को किसी ने भी हृदयस्थ नहीं किया।
विभीषण रावण को विनती करके कहता है कि श्री राम को सीता जी सौंप दे तो रावण उसकी सलाह की अवहेलना करके विभीषण को लात मारता है। जिसके प्रति आसक्ति होती है उसकी लात और संत की कोई बात हृदय में लगती है तब जीव ईश्वर की शरण जाता है। रावण का पद प्रहार विभीषण को रामचरण की याद दिलाता है। और वह लंका छोड़कर राम के पास चला जाता है। राम विभीषण को बाहुपाश में जकड़ लेते हैं और लंकेश कहकर उसके भाल पर तिलक करते हैं। हनुमान जी जैसे संत रावणी विचार धारा को छोड़कर जीव को राम शरणागति स्वीकारने की प्रेरणा देते हैं। शरणागति दो प्रकार की होती है।
1. बिल्ली अपने बच्चे को मुहँ से पकड़ती है। बिल्ली के जो दांत चूहे को मार डालते हैं वहीं दांत स्वयं के बच्चे को सुरक्षा प्रदान करते हैं। बच्चे की पूरी जवाबदारी माँ उठाती है।
2. बंदरी का बच्चा अपनी माँ की छाती से चिपककर रहता है। अपने दोनों हाथों सेवह माँ को पकड़े रहता है। हाथ छूट भी सकते हैं। यहाँ पकड़ने की जवाबदारी बच्चे की है। प्रभु भोगवादी सुग्रीव को 'राजपद' देते हैं जबकि भक्त विभीषण को 'निजपद' देते हैं।
ज्ञान मार्ग में समर्थता को उपलब्धि मानते हैं जबकि भक्ति मार्ग में शरणागति, संपूर्ण असमर्थता ही योग्यता बन जाती है। बिल्ली के बच्चे जैसी शरणागति श्रेष्ठ है।
एक संत कहते हैं हनुमान जी ने विभीषण को भी मंत्र दे दिया। केवल माला फेरने से काम नहीं चलता उनका काम भी करो। अच्छे लोग निष्क्रिय नहीं होने चाहिए। हनुमान जी कहते हैं राम जप तो करते हो तुम पर, सीता जी की मुक्ति के लिए कोई कर्म नहीं करते, ऐसे कैसे भक्त हो तुम? काम छोड़कर भक्ति के पीछे मत भागो। कामचोर भक्त नहीं हो सकता। विभीषण ने यह मंत्र मान लिया और रावण के पास जाकर सीता हरण का विरोध किया। रावण ने यह सुनकर लात मारकर उसे निकाल दिया। रावण की लात मिली तो राम के चरण मिल गए। संतों के वचन स्वीकार कर चलने में कभी नुकसान नहीं होता। विभीषण को आते देख राम कहते हैं पधारो 'लंकेश'। हनुमानजी ने लंका में आग लगाई। रावण के सगे भाई को राम के साथ जोड़ देना-कम आग नहीं है। केवल भौतिक वातावरण में जीने वाले जल ही रहे हैं। 'जीए तन से मन से मरे जा रहे हैं।' लंका इस तरह पहले ही जल रही थी। रावण और विभीषण में फूट डाल दी और राम के साथ जोड़ दिया फिर भी विभीषण भ्रातृद्रोही नहीं कहलाया। राम ने सबसे पूछा विभीषण को स्वीकार करना या नहीं। सबके मना करने पर भी हनुमान जी के कहने पर रामचन्द्र जी ने विभीषण का स्वीकार कर लिया। कितना विश्वास है हनुमान जी पर राम का?
श्वास पर अस्तित्व टिकता है और विश्वास पर संबन्ध टिकता है। हनुमान जी दूसरे का विश्वास जीत सकते हैं।
एक संत कहते हैं, हनुमान जी को मंदोदरी तेजस्वी और सीता की तरह लगे त क्योंकि वह पतिव्रता थी। लेकिन हनुमान जी को तुरन्त लगा कि सीता कामी पुरुष के छत्र नीचे नहीं हो सकती। इसीलिये THINK BEFORE YOU PROCEED.
तिलक छापे करने से भक्त नहीं होता। सुबह उठते ही चाय-काफी मांगे वह भक्त नहीं। विभीषण ने जागते ही राम नाम लिया। सच्चा भक्त वहीं जो सुबह उठते ही हरि का नाम लेता है।
हम हनुमान जैसे भक्त भले ही न बन सकें पर विभीषण जैसे तो बन सकते हैं। विभीषण कहता है हनुमान जी से, मैं दांतों में तो जीभ की तरह रहता हूँ। जप-तप नहीं होता। मेरा भाई राम की पत्नि को उठा लाया। मैं भगवान के पास कैसे जाऊं? तब हनुमान जी ने उसे मंत्र दे दिया, जिसे उसने माना तो वह सोने की लंका का राजा बन गया। क्या मंत्र दिया? तुम जैसे हो वैसे ही प्रभु को अर्पण कर दो। भगवान से क्या छुपाना। वहाँ ढोंग की जरूरत नहीं।
श्रवन सुजसु सुनि आपहु, प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरती हरन, सरन सुखद रघुवीर ।।
भगवान ने उसे शत्रु का भाई होते हुए भी लक्ष्मण के समान स्वीकार किया।
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