चौपाई जय-जय-जय हनुमान गुसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नंहि ।। ३७ ।।

चौपाई जय-जय-जय हनुमान गुसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नंहि ।। ३७ ।।

जय जय जय हनुमान गोसाई तीन बार जय शब्द दोहराया है। जय ध्वनि भक्त की भगवान के प्रति उत्कट भक्ति भावना का द्योतक है। संस्कृत में जयति और जयते शब्द प्रचलित हैं। हमारे राष्ट्र का प्रतीक वाक्य 'सत्यमेव जयते' में भी सत्य की ही जय ध्वनि है। सीतारामो जयति जयतु भारतम्, आदि। जयध्वनि हृदयोल्लास कारक, आत्म विश्वास वर्धक और उत्साहवर्धक होती है। युद्धकाल में भी जयध्वनि द्वारा वीरों का उत्साहवर्धन किया जाता है। जयशंकर, जय श्री राम, जय सियाराम, जय भवानी, जय महाकाल, जय हनुमान आदि जय ध्वनि सुनने को मिलती है। हनुमान चालीसा का शुभारंभ ही जय ध्वनि से हुआ है।

'जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।' समर्थ गुरु राम दास का जयघोष भी 'जय जय समर्थ रघुवीर' हनुमत भक्ति से ओत-प्रोत था। तुलसीदास जी हनुमानजी को गुरु रूप में मानते हैं अतः जयघोष करते हुए कहते हैं, "जय जय जय हनुमान गोसांई।" हनुमान चालीसा के प्रारंभ में दो बार और अन्त में तीन बार जय ध्वनि का गूढ़ भावार्थ है। तीन बार जयकार अर्थात् तीनों काल में हनुमानजी की जय है। तीनों, लोकों (पृथ्वी, स्वर्ग एवं पाताल), आधिभौतिक-आधिदैविक और अध्यात्मिक, कायिक-वाचिक और मानसिक, देव-दानव और मानव सबमें आपकी जय-जयकर होती है। कुल पाँच बार जय ध्वनि करके हनुमानजी के पंचमुखी स्वरूप (कपि, नृसिंह, वराह, गरुड़ और अश्व) का स्मरण किया है।

हनुमान गोसांई - श्री हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं। रामानंद, निम्बार्क, रामानुज आदि में ब्रह्मचर्य पूर्वक भक्ति साधना का विशेष महत्त्व है। जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी संतों का विशेष महत्त्व होता है। यति ब्रह्मचारी संत स्वरूप ही माने जाते हैं। गोसाई शब्द का तत्सम रूप है गोस्वामी। गो का अर्थ है इन्द्रियाँ। इन्द्रियों का स्वामी अर्थात् जिसकी इन्द्रियाँ वश में हो। जितेन्द्रिय। इसलिये ब्रह्मचारी संतों का सम्मान स्वरूप गौस्वामी शब्द से संबोधित किया जाता है।

एकादश रुद्रावतार हनुमानजी मन सहित पंच ज्ञानेन्द्रियों व पंच कर्मेन्द्रियों के स्वामी हैं। अतः हनुमानजी जितेन्द्रिय गोस्वामी हैं।

कृपा करहु गुरुदेव की नांई - तुलसीदास जी गुरुभाव से हनुमानजी की अभ्यर्थना करते हैं, कारण श्री सीताराम जी की कृपा हनुमानजी के आशीर्वाद से ही संभव है। गुरुदेव की भांति कृपा की आकांक्षा की गई है। हनुमान चालीसा के आरंभ में भी तुसलदासजी गुरु वंदना करते हैं "श्री गुरु चरण सरोज रज" गुरु शिष्य का सदा सर्वत्र हित चिन्तन करता है। उसके अवगुणों को दूर करके कृपा करता है। काक भुसुंडि प्रसंग में गुरुकृपा से रामभक्ति प्राप्ति का प्रसंग सर्व विदित है।

गुरु (गु अंधकार, रु प्रकाश) गुरु अज्ञान रूपी अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश करता है। हनुमानजी भी यही करते हैं। रामचरित मानस जैसा अपूर्व ग्रंथ हनुमानजी की कृपा से ही संभव हुआ। विभीषण को राम शरणागति का मंत्र हनुमानजी ने ही दिया। सुग्रीव को भी परमात्मा से मिला दिया। सद्‌गुरु वही जो परमात्मा को शिष्य के सामने खड़ा कर दे। हनुमान जी ने सद्‌गुरु की भूमिका अच्छी तरह निभाई है। सूर्यनारायण हनुमानजी के गुरु हैं। उन्होंने उनसे विद्या प्राप्त की है। सूर्य राजा हो या रंक, चोर या साहूकार, शत्रु या मित्र, विद्वान या मूर्ख के भेद-भाव बिना सबको एक समान प्रकाश और उर्जा प्रदान करते हैं। तुलसीजी हनुमानजी की जय जयकार करते हुए कहते हैं कि मुझे आपका शिष्य समझकर आप मुझ पर कृपा करो।

यहाँ तुलसीजी अपने गुरुदेव को याद कर रहे हैं। उनके उपकार का स्मरण करते हुए कहते हैं जिस तरह मुझ अनाथ और साधनहीन को मेरे गुरुदेव ने अपनाया उसी तरह आप भी मुझे अपनाकर मुझे आपके चरणों में रखो।
रावण राक्षस था परन्तु उसने शिवजी का शिष्यत्व स्वीकारा था इसलिये हनुमान रूप में आए हुए शिवजी उसको भरी सभा में मनाते हैं। प्रभुराम का विरोध नहीं करने को कहते हैं पर रावण उनकी अवहेलना करके सर्वनाश को बुलावा देता है।

सद्‌गुरु के पास साम, दाम, भेद और दंड चारों नीति होती है और शिष्य के लिये वे इन चारों का जरूरत पड़ने पर उपयोग करते हैं।

बाम नीति - गुरु प्रत्येक शिष्य के लिए समभाव रखते हैं, उसे अनुशासन में रखते हैं और जो आज्ञा पालन करता है उसे प्रिय पात्र मानते हैं।

म नीति - शिष्य के सदाचरण और सेवा करने पर वे पुरस्कार रूप में उसकी इच्छा पूर्ति करते हैं।

द नीति - शिष्य यदि कुसंग में पड़ जाय तो उसे उसके मित्रों और संबंधियों से छुड़ाते हैं।
दंडनीति शिष्य आवेश में आकर गलत काम करे तो उसे दंड भी देते हैं। हनुमानजी के पास ये चारों नीतियाँ हैं और उनका वे उपयोग भी करते हैं। हनुमान जी का शिष्यत्व विभीषण ने स्वीकारा और शिवजी का शिष्यत्व रावण ने। दोनों में समभाव रखकर उन्हें राम की शरण जाने को कहते हैं। विभीषण उनका यह मंत्र स्वीकारता है तो उसे इच्छित फल मिलता है। रावण उनकी अवहेलना करता है तब वे दमोगुणी रावण और विभीषण में भेद डलवाकर विभीषण को राम का शरणागत बनाकर लंकेश्वर बनाते हैं। रावण भी शिवजी का शिष्य है पर वह दुराचारी और राम विमुख बन जाता है तब उसे प्रभु राम द्वारा दंड दिलाने में हनुमान जी बिलकुल हिचकिचाते नहीं। मृत्यु के बाद प्रभु राम में उसका तेज समा जाता है और उसका उद्धार हो जाता है। प्रत्येक नीति के पीछे सदगुरू का उद्देश्य केवल कृपा का होता है।

गुरु कृपा शुद्ध सात्विक दूध जैसी है। पात्र अशुद्ध हो तो उसके दूध फट जाता है और स्वच्छ हो तो उसमें दूध रखने पर लाभदायक होता है। रावण अहंकारी है अतः उसके पात्र में हनुमान जी की कृपा नहीं ठहरती विभीषण विनम्र है योग्य पात्र है उसमें कृपा रूपी दूध बराबर रहता है और पुष्टि प्रदान करता है।

शास्त्र के अनुसार ब्रह्मा सृष्टि का सृजन, विष्णु पालन और शिव संहार (प्रलय) करते हैं। गुरु भी ब्रह्मा बनकर शिष्य को ज्ञान देते हैं। विष्णु बनकर उत्तम विचारों का पोषण करते हैं और शिव बनकर शिष्य के दुर्गुणों और कुविचारों का नाश करके उसे श्रेष्ठ मानव बनाते हैं।

राम चरित मानस शंकर जी को "त्रिभुवन गुरु" कहती है। शिवजी ने ही हनुमान जी का रूप लिया है। गुरु ही शंकर रूप है इसलिये तुलसीजी कहते हैं हनुमान जी को कि आप गुरु बनकर मुझ पर कृपा करो और मेरे दुर्गुणों का नाश करो।

अनाज गोडाउन में हो तब तक किसी की भूख नहीं मिटती। कोई गोडाउन की चाबी लेकर आवे और अनाज दे तब चमत्कार होता है। गोडाउन का मालिक बड़ा नहीं, अनाज देने वाला महान है। अनाज को केवल देखने से नहीं, खाने पर भूख मिटती है। ठीक इसी तरह राम घट-घट में व्यापक है, शरीर गोडाउन है और इसमें अनाज रूपी ईश्वर है। सद्‌गुरु जीवन में आवे तब अज्ञान रूपी ताले को खोलकर गुरु मंत्र देकर शिष्य को जन्मोजन्म की दर्शन की भूख को राम के दर्शन करा मोक्ष रूपी तृप्ति दिलाते हैं। इसलिए ईश्वर से भी सद्गुरु महान है। अनाज से भी अनाज देने वाला महान है।

एक संत कहते हैं, तीन बार जय यानि हमारे तीनों कर्म, तीनों गुण, तीनो अवस्थाओं में आपका राज हो। सब पर आपकी विजय हो। हनुमान जी को गुसांई कहते हैं। गुसांई गोस्वामी का अपभ्रंश है। जो यानि इंद्रियां और सांई यानि मालिक। गो यानि गाय भी होता है। गाय जैसे चरने जाती है वैसे हमारी इन्द्रियों को वश में कर लिया है। भगवान की भक्ति करने से इन्द्रियाँ ही रोकती है। एक आदत छूटती है तो दूसरी लग जाती है। चाय छोड़ी तो कॉफी लग गई।

हनुमान जी लंका में गए कई स्त्रियाँ को अस्त व्यस्त अवस्था में देखा पर कोई विकृति नहीं आई। हमारा मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ आपके वश में हो जाएँ। हम तो मांग भी नहीं सकते। गुरु जैसे शिष्य पर कृपा करता है वैसे आप भी कृपा करें हम पर। गुरु कभी शिष्य का त्याग नहीं करते। आप हमारे गुरु बनो और हम पर गुरुदेव की तरह कृपा करो।

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