चौपाई राम रसायन तुम्हरे पासा । सादर हो रघुपति के दासा
चौपाई राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सादर हो रघुपति के दासा।।
आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार यदि किसी औषधि को खूब असरकारक बनानी हो तो उसे अलग अलग रस की भावना देकर सिद्ध किया जाता है। इस प्रकार तैयार की हई औषधि रसायन कहलाती है। ऐसे रसायन असाध्य रोगों को दूर कर देते हैं और वृद्धावस्था को दूर रखते हैं।
धर्म शास्त्र परमात्मा को "रसो वै सः" कहते हैं। प्रभु स्वयं रस स्वरूप हैं। रसायन अर्थात रस के भंडार। राम रूप रसायन हनुमान जी के पास हमेशा रहता हैं। जिससे हनुमान जी भक्तों के सांसारिक शारीरिक और मानसिक रोग दोष दूर करें। कारण वे आदर सहित राम रूप पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर की सेवा में दास रूप में रहते हैं।
कथा बुद्धि और चरित्र की खुराक है। हनुमान जी सदा राम कथा सुनते। कथा से ईश्वर के ऐश्वर्य और महिमा का ज्ञान होता है और प्रभु पर भरोसा दृढ़ होता है। हनुमान जी भगवान नाम संकीर्तन में मगन रहते हैं, इसलिये वे 'रघुपति प्रिय भक्त ' हैं। नाम स्मरण मन को शांत, प्रसन्न और पुष्ट करता है। माता जब लोरी सुनाती है रोता हुआ बालक शांत हो जाता है उसी तरह संकीर्तन में मन सहज रूप से शांत हो जाता है। शरीर की स्वस्थता के लिये अन्न और पानी आवश्यक है उसी तरह मन की स्वस्थता के लिये राम कथा और राम नाम जरूरी है।
अन्न को चबाना और पचाना पड़ता है उसी तरह भगवद् कथा को भी एकाग्रता पूर्वक पढ़कर उस पर मनन चिंतन करना होता है। तब वह कल्याणकारी बनकर बुद्धि को निर्मल करती है, पुष्टि देती है।
प्रभु नाम मधुर फलों के रस जैसा है। जैसे रस मुहँ में जाता है हमें स्वाद, ठंडक और तृप्ति का अनुभव होता है।
प्रभु नाम या भगवद् चरित्र को कोई गाने या कहने लगता है तो आरंभ में बोलना आसान लगता है उसमें ज्ञान और भक्ति को धन्यता लगती है परन्तु शब्दों के विस्तार की एक सीमा है। हम जब नदी या तालाब में स्नान करने जल में उतरते है शुरुआत में बोल सकते हैं। परन्तु गहरे जल में डुबकी लगाने पर शब्द समाप्त हो जाते हैं। दिव्य अनुभूति मौन में संभव है। नाम रस में भाव भक्ति में डुबकी लगाने वाला प्रभु के नजदीक पहुँच जाता है। प्रभु नाम रसमय है चित्त की चंचल वृत्तियाँ सिमटकर रस स्वरूप राम में एकाकर बन जाने पर शब्द, वाणी जैसा कुछ शेष नहीं रहता तब केवल परमात्मा शेष रहता है।
हनुमान जी प्राणतत्व है व्यापक तत्व है। इनका मंदिर प्रत्येक गांव, शहर या गली के कोने पर होता है। शायद ही किसी अन्य देवता की इतनी पूजा प्रतिष्ठा होती होगी। भरत जी हनुमान जी जितने ही प्रभु राम के प्यारे हैं स्वयं भगवान उनका जप करते हैं तो फिर भरत जी का मंदिर क्यों नहीं होता?
श्री रामकिंकर जी इसका सुंदर उत्तर देते हैं कि हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता है जबकि भरत जी अति श्रेष्ठ लेकिन उनका अलग व्यक्तित्व है। भरत जी के चरित्र को सुनने से वैराग्य होता है। जीव मात्र को अष्ट सिद्धि और नौ
निधियाँ चाहिए, न कि वैराग्य और प्रभु चरणों की प्रीति। इसलिये भरत जी का कहीं भी अलग मंदिर नहीं है।
श्री मुरारी बापू कहते हैं, "हनुमान जी चार प्रकार से प्रभु राम की सेवा करते हैं।" (1) ममता, (2) समता (3) क्षमता (4) नम्रता। हमको भी हनुमान जी के 'राम काज' से प्रेरणा लेकर समाज के प्रत्येक जरूरतमंद और दुःखी व्यक्ति की ममता पूर्वक सेवा करनी चाहिये। तब वह ममता बाधक नहीं बनती कारण सबके प्रति ममत्व होने पर चित में हम समता बनाए रख सकते हैं। ममता को मोड़ देना जरूरी है। परिवार के प्रति सीमित ममता समाज के लिए मुड़ जाय, चित्त में 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना पैदा हो तो ममता सार्थक हो जाती है।
सेवा अपनी क्षमता के अनुसार करनी चाहिये। यदि स्कूल नहीं बना सकते तो किसी विद्यार्थी को पुस्तकें तो दिला ही सकते हैं। अस्पताल नहीं बंधवा सकते हों लेकिन बीमार व्यक्ति को दवाई या रक्तदान तो कर ही सकते हैं।
यह सब करते समय स्वभाव में नम्रता होनी चाहिये। किसी दीन, लाचार या दुःखी व्यक्ति का अपमान न कर बैठें इतनी सावधानी रखने पर प्रभु राम जरूर प्रसन होते हैं।
एक संत कहते हैं जानकी जी ने आशीर्वाद देकर हनुमान जी को अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता बना दिया फिर भी हनुमान जी प्रसन्न नहीं हुए। हनुमान जी ने सोचा तो सब तुच्छ चीजें हैं। भक्ति से बड़ा कोई धन या शक्ति नहीं हो सकती। तब सीता ने कहा, "राम रसायन तुम्हरे पासा, सादर हो रघुपति के दासा ।" तब हनुमान जी का चेहरा खिला और सीता जी को प्रणाम किया । जब किसी से कुछ मिल जाय तब प्रणाम करो यानि स्वीकार कर लो। तब सीता जी समझ गई कि इन्हें भगवान का दास बनना है। सेवा उन्हीं को मिलती है जिनका भाग्य बड़ा हो और राम की कृपा हो गुरु की कृपा हो।
किसी भी तरह भगवान से मन लग जाना चाहिये। शूर्पणखा ने कामना से ही भगवान को चाहा पर लक्ष्मण तो वैराग्य मूर्ति हैं उन्होंने उसके नाक और कान काट दिये क्योंकि कामना नाक और कान से ही आती है।
एक संत कहते हैं, हनुमान जी के लिए अष्ट सिद्धि नवनिधि तुच्छ है क्योंकि उनके पास तो राम रसायन है। जिसे राम रतन धन मिल जाय बाकी का धन वह बांटता है। उनको इतना ही चाहिये कि राम का दास बने । स्वामी बनना ही नहीं है।
लड़की शादी करके ससुराल जाती है तब पहले सेविका बनती है, फिर पति की सखी और 5-10 वर्ष में मालिक बन जाती है। जो दास रहता है उसका सामर्थ्य बढ़ता है। भगवान के चरणों में जिसका सिर झुकता है वही आसमान में उड़ सकता है। इसलिए राम चरणों में हाथ जोड़े बैठे हनुमान जी का चित्र उड़ने वाले से ज्यादा उत्तम लगता है।
राम का दास आंतरिक विकारों से मुक्त होकर अंततः स्वामी बनता है, राम की दासता से सामर्थ्य बढ़ता है। हमें हमेशा दास रहना है। वह स्वामी जाने कि हमें आगे कहां ले जाना।
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