दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।।
दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।। हे पवन पुत्र आप संकट हरने वाले और मंगल करने वाले हैं। आपकी मूर्ति कल्याणकारी हैं। आप राम, लक्ष्मण, सीता सहित मेरे हृदय में निवास करो। हनुमान चालीसा की शुरुआत गोस्वामी "पवन कुमार" संबोधन से करते हैं और यहाँ समाप्ति में भी 'पवन तनय' कहते हैं। 'पवन तनय' नाम बहुत महत्त्वपूर्ण है। पवन अनेक प्रकार से बहता है। प्रभु के जन्म प्रसंग का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं। सीतल मंद सुरभि बड़ बाउ । हरषित सुर सन्तन्ह मन चाउ ।। अर्थात् शीतल, मंद, सुगंधित पवन बह रहा था। देवता ऐसे वातावरण से हर्ष अनुभव कर रहे थे और संतों के मन में प्रसन्नता छलक रही थी। चालीसा के आरम्भ में तुलसी जी बल बुद्धि और विद्या मांगते हैं। बल को नियंत्रण में रखे ऐसी बुद्धि और बुद्धि को नियंत्रण में रखे ऐसी विद्या ही जीवन को उर्ध्वगामी करती है। वे बल की सौम्यता, बुद्धि की शीतलता और विद्या की सुगंध प्राप्त करने के लिए ऐसे मंद मंद बहते हुए वायुदेव के पुत्र का स्मरण करते हैं। यहाँ चालीसा की समाप्ति में वे संकट हरन पवन तनय को या...