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दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।।

दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।। हे पवन पुत्र आप संकट हरने वाले और मंगल करने वाले हैं। आपकी मूर्ति कल्याणकारी हैं। आप राम, लक्ष्मण, सीता सहित मेरे हृदय में निवास करो। हनुमान चालीसा की शुरुआत गोस्वामी "पवन कुमार" संबोधन से करते हैं और यहाँ समाप्ति में भी 'पवन तनय' कहते हैं। 'पवन तनय' नाम बहुत महत्त्वपूर्ण है। पवन अनेक प्रकार से बहता है। प्रभु के जन्म प्रसंग का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं। सीतल मंद सुरभि बड़ बाउ । हरषित सुर सन्तन्ह मन चाउ ।। अर्थात् शीतल, मंद, सुगंधित पवन बह रहा था। देवता ऐसे वातावरण से हर्ष अनुभव कर रहे थे और संतों के मन में प्रसन्नता छलक रही थी। चालीसा के आरम्भ में तुलसी जी बल बुद्धि और विद्या मांगते हैं। बल को नियंत्रण में रखे ऐसी बुद्धि और बुद्धि को नियंत्रण में रखे ऐसी विद्या ही जीवन को उर्ध्वगामी करती है। वे बल की सौम्यता, बुद्धि की शीतलता और विद्या की सुगंध प्राप्त करने के लिए ऐसे मंद मंद बहते हुए वायुदेव के पुत्र का स्मरण करते हैं। यहाँ चालीसा की समाप्ति में वे संकट हरन पवन तनय को या...

चौपाई जो यह पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा ।।३९॥

चौपाई जो यह पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा ।।३९॥ हनुमान चालीसा के पढने की कोई विधि नहीं है. नियम नहीं है। अखबार की तरह पढोगे तो भी बेडा पार हो जाएगा। इसका एक ही नियम है नित्य पाठ करो। और खंडित न हो यही निषेध है। इसके साक्षी स्वयं शंकर भगवान हैं। और उनके पास अनेक सिद्धियाँ हैं। अशोक वाटिका में माँ जानकी ने उनको आशीर्वाद दिया। सब देवता सब सुख नहीं दे सकते लेकिन हनुमान जी भौतिक आध्यात्मिक, लोक-परलोक, भोग और भगवान को भी प्राप्त करा सकते हैं। दुनियाँ में देव हजारों हैं, बजरंग बली का क्या कहना। इनकी भक्ति का क्या कहना, इनकी शक्ति का क्या कहना ।। ये सात समुन्दर लांघ गए, और गढ़ लंका में कूद गए। रावण को डराना क्या कहना, लंका को जलाना क्या कहना ।। जो प्रारब्ध में नहीं है या भाग्य में नहीं है वह भी हनुमान जी प्राप्त करा देते हैं। इसकी साक्षी भगवान शंकर दे रहे हैं। जो भाग्य में नहीं है और यदि गलत लिखा गया उसे भी मिटाना भगवान शंकर के ही बस की बात है। सब प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाले हैं वे भगवान को समुद्र के पार करवाया हमें भी भवसागर से पार करा देंगे। तुलसीदासजी यहाँ पाठ की फलश्र...

चौपाई तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महें डेरा ।। ४०।।

चौपाई तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महें डेरा ।। ४०।। कामना सिद्धि या इच्छा पूर्ति कोई नई समस्या पैदा कर सकती है। इसलिये तुलसी जी कामनाओं के स्थान पर हृदय में स्वयं हनुमान जी को ही आकर रहने को कह रहे हैं। जैसे कोई बड़ा आदमी अपने सेवक के घर करूणा या कृपा के कारण कभी उसके घर जाकर उसे कृतार्थ करता है, उसी तरह हे नाथ! आप भी मेरे हृदय में पधारो और मुझे कतार्थ करो। आप आगे इतना ही नहीं वहाँ अचल निवास करो 'डेरा डालो।' ऐसा देखने में आता है कि बहनें हनुमान जी के मंदिर में जाती है तब दोनों हाथ पीछे रखकर दूर से दर्शन करती हैं। हनुमान जी नैष्ठिक ब्रह्मचारी है इसलिये बहनें उनके चरणस्पर्श नहीं कर सकती। किसी भी देवी देवता का पूजन करना हो तब विवाहित स्त्री-पुरुषों को जोड़े से बैठना चाहिये परन्तु हनुमान जी की पूजा में पुरुष ही बैठ सकते हैं, स्त्रियाँ नहीं। हनुमान जी परम पवित्र देव हैं। उनकी नजर में स्त्री-पुरुष का भेद भाव नहीं किन्तु ऐसे जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी के प्रति आदर व्यक्त करने के लिए पुरुषों को भी स्नान किये बिना उनकी पूजा या स्पर्श नहीं करना चाहिये, ऐसा संत कहते हैं। बहनों को हाथ...

चौपाई- यह सत बार पाठ कर कोई। छूटै बंदि महसुख होई ।। ३८ ।।

चौपाई- यह सत बार पाठ कर कोई।            छूटै बंदि महसुख होई ।। ३८ ।। सत का एक अर्थ होता है सात, दूसरा अर्थ होता है एक सौ। बार अर्थात समय या वार (दिन)। हनुमान जी का दिन मंगलवार। (१) हमेशा सौ बार पाठ करना या सात बार पाठ करना। (२) हर मंगलवार को सौ बार पाठ करना। ऐसा करने से परमसुख की प्राप्ति होती है मनोविज्ञान कहता है कि विचारों या भावों को निष्ठा, आत्मबल और दृढ़ संकल्प से बार बार दोहराने पर उनके अनुसार फल निश्चित मिलता है। भवबंधन से मुक्ति चाहिये तो मृत्यु पर्यंत रोज हनुमान चालीसा का पाठ करने से शरीर छूटने पर मुक्ति मिलती है। एक संत कहते हैं हनुमान चालीसा का जो सौ बार पाठ करेगा। वह बंधन से छूट जाएगा। मुक्ति में आनन्द है, बन्धन में नहीं। बन्धन में सुरक्षा तो है पर स्वातंत्र्य नहीं। पिंजरे के पक्षी के पास आकाश नहीं। बन्धन बड़ा दुःख है और मुक्ति महा सुख। 'सा विद्या या विमुक्तये।' गुरु कृपा से ही मुक्त हुआ जा सकता है। "यह सत बार पाठ कर कोई"। 'कोई' कहा है। केवल पुरुष के लिए ही नहीं, स्त्रियाँ भी हनुमान चालीसा का पाठ कर सकती हैं। नारी तो क्या पशु पक्षियों का भी, जो...

चौपाई जय-जय-जय हनुमान गुसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नंहि ।। ३७ ।।

चौपाई जय-जय-जय हनुमान गुसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नंहि ।। ३७ ।। जय जय जय हनुमान गोसाई तीन बार जय शब्द दोहराया है। जय ध्वनि भक्त की भगवान के प्रति उत्कट भक्ति भावना का द्योतक है। संस्कृत में जयति और जयते शब्द प्रचलित हैं। हमारे राष्ट्र का प्रतीक वाक्य 'सत्यमेव जयते' में भी सत्य की ही जय ध्वनि है। सीतारामो जयति जयतु भारतम्, आदि। जयध्वनि हृदयोल्लास कारक, आत्म विश्वास वर्धक और उत्साहवर्धक होती है। युद्धकाल में भी जयध्वनि द्वारा वीरों का उत्साहवर्धन किया जाता है। जयशंकर, जय श्री राम, जय सियाराम, जय भवानी, जय महाकाल, जय हनुमान आदि जय ध्वनि सुनने को मिलती है। हनुमान चालीसा का शुभारंभ ही जय ध्वनि से हुआ है। 'जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।' समर्थ गुरु राम दास का जयघोष भी 'जय जय समर्थ रघुवीर' हनुमत भक्ति से ओत-प्रोत था। तुलसीदास जी हनुमानजी को गुरु रूप में मानते हैं अतः जयघोष करते हुए कहते हैं, "जय जय जय हनुमान गोसांई।" हनुमान चालीसा के प्रारंभ में दो बार और अन्त में तीन बार जय ध्वनि का गूढ़ भावार्थ है। तीन बार जयकार अर्थात् तीनों काल में हनु...

चौपाई संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ।। ३६।।

चौपाई संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ।। ३६।। हनुमान चालीसा या हनुमान अष्टक पढ़ने मात्र से ही संकट दूर हो जाते हैं। शनि के प्रकोप से बचाव के लिये हनुमान जी की भक्ति उत्तम है। संजीवनों लेने जब हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत से लौट रहे थे तो रावण ने उन्हें वहीं रोके रखने के लिए शनि को पीछे लगा दिया लेकिन हनुमान जी ने बुद्धि और बल से शनि को अपने पैरों के नीचे कुचलकर बांध दिया। शनि ने हार मानकर छोड़ देने की याचना की तब हनुमान जी ने कहा कि तुम इस शर्त पर बच सकते हो कि जब कोई व्यक्ति राम नाम का जय करे तो तुम उसे परेशान नहीं करोगे। यदि किसी बड़े आदमी के साथ अपना व्यक्तिगत संबंध हो तो उसके द्वारपाल हमें बाधा रूप बनने के बजाय  नमस्कार करके सीधे उस व्यक्ति को मिलने जाने देते हैं। इसी तरह हनुमान जी की सेवा से कोई बाधा या संकट हो तो वह कट जाता है। भाग्य के देव विधाता भी अड़चन पैदा नहीं करते। इसके पहले की चौपाई में तुलसीजी ने कहा "संकट ते हनुमान छुड़ावै" जब कि यहाँ कहते हैं "संकट कटै मिटे सब पीरा।"  हनुमान जी संकट से छुड़ाते है और हनुमान जी का स्मरण संकटों को काट देता ...

चौपाई और देवता चित्त न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई ।। ३५ ।।

चौपाई और देवता चित्त न धरई,            हनुमत सेई सर्व सुख करई ।। ३५ ।। जो भाग्य में नहीं है, प्रारब्ध में नहीं है। वह भी हनुमान जी प्राप्त करा देते हैं। हनुमान जी की सेवा और स्मरण से सब प्रकार के सुख मिलते हैं तो फिर दूसरे देवी-देवता को चित्त में स्थान देने की क्या जरूरत है। हनुमान जी में संपूर्ण आस्था रखने से, हृदय में उन्हें एक मात्र स्थान देने से सब सहज में प्राप्त होता है। भक्ति में अनन्यता जरूरी है। इन्द्र, वरूण, अग्नि, कुबेर ये सब देवता कहलाते हैं। जबकि शिवजी 'महादेव' कहलाते हैं। रूद्रावतार महावीर सर्व समर्थ हैं। कुबेर केवल धन के देवता हैं, वरूण जल के देवता है परन्तु भक्त की जो भी इच्छा हो महादेव उसे दे सकते हैं। इसलिये तुलसी जी कहते हैं जो भी चाहिए सुख-समृद्धि आदि वह हनुमान जी की सेवा करके प्राप्त करो। अनन्यता से सिद्धि अनायास मिलती है। रामचरित मानस में कहा है - सो अनन्य जाके असि मति न टरे हनुमंत।  मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत ।। अनन्यता दूसरों की अवगणना करने को नहीं कहती। अन्य देवी-देवताओं के साथ कैसे व्यवहार करना, सीखना चाहिये। मछली की अनन...