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सहस बदन तुम्हारो जस गावै, अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ।। १३ ।।

चौपाईं - सहस बदन तुम्हारो जस गावै,             अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ।। १३ ।। हजार मुँह तुम्हारा यश गाएं ऐसा कहकर प्रभु राम ने आपको गले लगाया है। स्वयं भगवान जिसे अपना मानकर गले लगावें और प्रेम करें उनकी महिमा का गान सब करते हैं। यशगान करने या कहने के लिये आवाज की जरूरत होती है और स्वर गले में होता है। प्रभु हनुमान जी को गले लगाकर मानों संकेत करते हैं कि इस गले की मर्यादा है, आवो तुम्हें यही रख लेता हूँ। याद आते ही, आंखों और हृदय में भाव में उफान आता है। शब्दों की जब सीमा आ जाती है तब स्पर्श को एक भाषा बनाकर जो कहना होता है वह आसानी से कहा या समझाया जा सकता है। यहां प्रभु राम भी कृपा पूर्ण दृष्टि और प्रेम पूर्ण स्पर्श की भाषा का प्रयोग करते हैं। लोग हमें बाहर से और भगवान हमें भीतर से जानते हैं। परमात्मा जिसके हो गए, सारी दुनियाँ उसकी हो जाती है। परमात्मा बिंब है दुनियां प्रतिबिंब है। प्रभु प्रीति अमर है लोक प्रीति चंचल है। भगवान (श्रीपति) बार बार हनुमान जी को गले लगा रहे हैं।