चौपाई तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महें डेरा ।। ४०।।
चौपाई तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महें डेरा ।। ४०।।
कामना सिद्धि या इच्छा पूर्ति कोई नई समस्या पैदा कर सकती है। इसलिये तुलसी जी कामनाओं के स्थान पर हृदय में स्वयं हनुमान जी को ही आकर रहने को कह रहे हैं। जैसे कोई बड़ा आदमी अपने सेवक के घर करूणा या कृपा के कारण कभी उसके घर जाकर उसे कृतार्थ करता है, उसी तरह हे नाथ! आप भी मेरे हृदय में पधारो और मुझे कतार्थ करो। आप आगे इतना ही नहीं वहाँ अचल निवास करो 'डेरा डालो।'
ऐसा देखने में आता है कि बहनें हनुमान जी के मंदिर में जाती है तब दोनों हाथ पीछे रखकर दूर से दर्शन करती हैं। हनुमान जी नैष्ठिक ब्रह्मचारी है इसलिये बहनें उनके चरणस्पर्श नहीं कर सकती। किसी भी देवी देवता का पूजन करना हो तब विवाहित स्त्री-पुरुषों को जोड़े से बैठना चाहिये परन्तु हनुमान जी की पूजा में पुरुष ही बैठ सकते हैं, स्त्रियाँ नहीं।
हनुमान जी परम पवित्र देव हैं। उनकी नजर में स्त्री-पुरुष का भेद भाव नहीं किन्तु ऐसे जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी के प्रति आदर व्यक्त करने के लिए पुरुषों को भी स्नान किये बिना उनकी पूजा या स्पर्श नहीं करना चाहिये, ऐसा संत कहते हैं। बहनों को हाथ पीछे बांधने की जरूरत नहीं दूर से दोनों हाथ जोड़कर सिर झुका सकती है।
शिवजी ने ही तुलसीदासजी को हनुमान चालीसा और विश्वामित्र को राम रक्षा स्त्रोत लिखने की प्रेरणा दी।
एक संत कहते हैं 'हरि' यानि जो हर ले, लूट ले। यहाँ हरि अर्थात् हनुमान जी ही हैं। 'हरि चेरा' हरि के दास हैं। हरि के और भी अर्थ हैं। हरि का एक अर्थ है 'बंदर', दूसरा अर्थ 'भगवान'। एक कवि ने लिखा है -
हरि आयो, हरि उपन्यो, हरि गयो हरि के पास। जब हरि हरि में गयो, तो हरि भयो उदास ।।
यहाँ हरि के अलग अलग अर्थ हैं -
हरि (वर्षा) आयो, हरि उपन्यो, हरि (सर्प) गयो, हरि (मेंढ़क) के पास। जब हरि (मेंढ़क), हरि (पानी) में गयो, तो हरि (सर्प) भयो उदास ।।
तुलसी दास जी कह रहे हैं "कीजै नाथ हृदय मुँह डेरा।" हमारे हृदय में हमेशा के लिये आइये लेकिन घूमने नहीं, हमारा हृदय गेस्ट हाउस नहीं है, निवास है। डेरा डालिये अर्थात् निवास करिये हृदय में।
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