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हिन्दूत्व मात्र एक धर्म नहीं, एक व्यापक विचारधारा है; जिसकी बाल्यावस्था पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः। तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्। अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत्। तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा।। पुत्रस्य यः महत्तीर्थ पित्रोश्चरणपंकजम्। अन्यतीर्थ तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः।। इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम्। पुत्रस्य च स्त्रीयाश्चैव तीर्थ गेहे सुशोभनम्।। ' जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है,  उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है।  जो माता-पिता को घर पर छोड़ कर तीर्थ यात्रा के लिए जाता है, वह माता- पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता- पिता के चरण सरोज ही महान तीर्थ है। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं, परंतु धर्म का साधन भूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है। पुत्र के लिए माता-पिता रूपी सुंदर तीर्थ घर में ही बुद्धिमान है।' ये मानव मात्र को सिखाया है प्रथम पूज्य श्री गणेश ने। ऐसे ही अगर एक और बालक का उदाहरण देखें विष्णु भक्त ध्रुव प्राचीन काल की बात है राज...