चौपाई और देवता चित्त न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई ।। ३५ ।।

चौपाई और देवता चित्त न धरई, 
          हनुमत सेई सर्व सुख करई ।। ३५ ।।
जो भाग्य में नहीं है, प्रारब्ध में नहीं है। वह भी हनुमान जी प्राप्त करा देते हैं। हनुमान जी की सेवा और स्मरण से सब प्रकार के सुख मिलते हैं तो फिर दूसरे देवी-देवता को चित्त में स्थान देने की क्या जरूरत है। हनुमान जी में संपूर्ण आस्था रखने से, हृदय में उन्हें एक मात्र स्थान देने से सब सहज में प्राप्त होता है।
भक्ति में अनन्यता जरूरी है। इन्द्र, वरूण, अग्नि, कुबेर ये सब देवता कहलाते हैं। जबकि शिवजी 'महादेव' कहलाते हैं। रूद्रावतार महावीर सर्व समर्थ हैं। कुबेर केवल धन के देवता हैं, वरूण जल के देवता है परन्तु भक्त की जो भी इच्छा हो महादेव उसे दे सकते हैं। इसलिये तुलसी जी कहते हैं जो भी चाहिए सुख-समृद्धि आदि वह हनुमान जी की सेवा करके प्राप्त करो। अनन्यता से सिद्धि अनायास मिलती है। रामचरित मानस में कहा है -
सो अनन्य जाके असि मति न टरे हनुमंत। 
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत ।।
अनन्यता दूसरों की अवगणना करने को नहीं कहती। अन्य देवी-देवताओं के साथ कैसे व्यवहार करना, सीखना चाहिये। मछली की अनन्यता जग प्रसिद्ध है।  'पानी नहीं तो जीवन नहीं' यह उसका जीवन मंत्र है। शरीर, मन या बुद्धि से जो अन्य लगे उस उसके प्रति कर्त्तव्य पालन करना चाहिये। संसार के सभी पुरुषों में स्त्री के लिये उसका एक पति ही उसके लिए 'वर' कहलाता है। वर अर्थात् श्रेष्ठ। गगन मंडल में अनेक तारे और नक्षत्र है पर चन्द्रमा एक ही है।
सच्चा भक्त प्रत्येक देवता को, माता-पिता को, गुरुदेव को, गणपति को, सरस्वती को, गुरु नारदजी जैसे अवधूत संतों को वंदन करता है और वन्दन करने के बाद क्या मांगता है? "देहु राम पद नेह निबाहू" अर्थात् विनती करता हुआ कहता है कि आप सब मुझ पर प्रसन्न होकर मेरी एक ही भावना पूर्ण करो, "मुझे प्रभु राम के चरणों में प्रेम प्रदान करो और उस प्रेम का मैं निर्वाह कर सकूँ ऐसी सन्मति दो।"
साकार ध्यान में मन को एकाग्र करना पड़ता है। एकाग्रता अर्थात् जहाँ एक की अग्रता हो। साधना में चंचलता अवरोध है। इसलिये जिस देव पर भरोसा हो उसे अपना ईष्टदेव मानकर ध्यान करना चाहिये। बार-बार ध्यान मूर्ति को बदलते रहने पर मन एकाग्र नहीं होता। गोस्वामी के उपास्य देव हनुमानजी है इसलिये उन्होंने मारूति को हृदय के आसन पर बिठाने को कहा है। श्री रणछोडदास जी महाराज बार बार कहते थे।
एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब जाय। 
जो तू सींचे मूल को, फूले-फले अघाय ।।
मंत्र माला और मूर्ति (इष्ट देव) एक ही रखने की शास्त्राज्ञा है। हनुमान जी अनन्य भक्त पर तुरंत प्रसन्न होते हैं। पक्की निष्ठावाले को दर्शन भी देते हैं। मालिक में कोई त्रुटि हो तो अन्य द्वारे पर हाथ लंबा करते हैं। हनुमान जी की उपासना से जब चारो पदार्थ मिलते हैं तो फिर अन्यत्र क्यों भटकना ?
प्रत्येक देव समर्थ होते हैं, उन पर हमारी श्रद्धा अडिग होनी चाहिये। जैसी भावना होती है वैसा ही फल मिलता है। 'हनुमान जी सदा मेरे साथ है, मेरी रक्षा करते हैं' यह भाव, ईश्वर के सन्निकट पन का भाव हमारे चित्त को सम बनाता है। मन-चित्त शांत स्वस्थ होते ही जीवन में आए हुए संकट सह्य बनते हैं। 
एक संत कहते हैं, क्या हनुमान के सिवाय अन्य देवता काम के नहीं? ऐसा नहीं है। परमात्मा के छोड़कर अन्य का आश्रय अनन्याश्रय है। हम कामनापूर्ति हेतु अनेक देवी देवताओं के पीछे जाते हैं। एक बार ईष्टदेव निश्चित हो जाय तो फिर जो कुछ चाहिये वह एक ही से लेना चाहिये। तब और किसी से नहीं मांगना चाहिये। सब देवताओं को प्रणाम। जैसे एक स्त्री सब पुरुषों से अच्छी रहती है लेकिन मांगती अपने ही पति से है अर्थात् अपने इष्ट में ही पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिये। परमात्मा को नहीं मानने वाले को नास्तिक नहीं कहते। जो ज्ञान (वेद) को नहीं मानता वह नास्तिक है। कपिल मुनि भगवान को नहीं मानते थे फिर भी गीता में भगवान ने कहा, "सिद्धानां कपिलो मुनि"। देवता कौन है? सरकार में भी प्रधान मंत्री एक ही होता है पर विभागीय मंत्री अलग अलग होते हैं जैसे एज्यूकेशन मिनिस्टर सरस्वती, वाटर मिनिस्टर-वरूण, एयर मिनिस्टर - पवन देव। लेकिन एक ही फोन काल प्रधान मंत्री को कर दो तो इशारे में सब काम हो हो जाते हैं। सब देवता एक ही ईश्वर के रूप में लेकिन जिस देवता को उठाओं उसी को सब कुछ मान लो। एक ध्यान मूर्ति होती है, एक भाव मूर्ति। आराध्य यदि राम हैं तो राम पर ध्यान कीजिए पर कृष्ण, महावीर, बुद्ध से कुछ न कुछ सीखना है। वे भाव मूर्ति है। उनका अनादर नहीं करना। 
जीवित व्यक्ति पर ध्यान नहीं करना चाहिये। कारण वह कभी भी बिगड़ सकता है और पास आने पर उसके दोष नजर आने लगते हैं। अतः ध्यान परमात्मा का ही करना चाहिये। मन के अभ्यास के लिये एक ही मूर्ति रखनी चाहिये। गुणग्राही दृष्टि होनी चाहिये। भाव दृष्टि होनी चाहिये। द्वेष करने का आवेश खड़ा नहीं करें। मुरारी में कोई परमार्थिक भेद नहीं है। मुरारी की भक्ति करने वाले को मुरारी का द्वेष नहीं होना चाहिये। किसी की श्रद्धा तोड़ो मत बल्कि उनकी श्रद्धा दृढ़ करो। जहाँ मन लग जाय उसका ध्यान करते रहो और गुण सबसे सीखते रहो। दत्तात्रेय के २४ गुणात्मक गुरु थे। अभ्यास के लिये ध्यान के लिये मूर्ति बदलें नहीं क्योंकि मन को भी आदत पड़नी चाहिये।
सूर्य मुख में ले लेने पर इन्द्र ने हनुमान जी के मुख पर वज्र प्रहार किया तो पवन देव ने हवा रोक दी, कारण एक बालक को मारा। सब देवता घबराए तो पवन देव ने कहा सब अपनी अपनी शक्ति हनुमान जी को दो, इसलिए हनुमान जी सब देवता की शक्ति है।

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