चौपाई आष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता ।। ३१।।

चौपाई आष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, 
         अस बर दीन जानकी माता ।। ३१।।
जानकीजी ने हनुमानजी को आठों सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान दिया था। आठ सिद्धियाँ हैं :
(1) अणिमा - शरीर को सूक्ष्म करना, अति कठिन पदार्थों में भी प्रवेश करना। वामन मांगते समय छोटे और मापते समय विराट हो गए।
(2) महिमा = वृहद रूप करना।
(3) गरिमा = शरीर को लौह समान बनाना, चाहे जितना वजनदार बनाना। जैसे रावण के दरबार में अंगद का पैर।
(4) लघिमा = स्वयं को भारहीन कर लेना। हल्का-फुल्का।
(5) प्राप्ति - अलभ्य वस्तु की उपलब्धि इच्छित पदार्थ की प्राप्ति। प्राप्त करने जाना नहीं पड़ता। जैसे समुद्र नदियाँ ढूंढने नहीं जाता, नदियाँ उसमें आती हैं।
(6) प्राकाम्य - लक्ष्यपूर्ति। पृथ्वी में भी समा सकना, आकाश में भी उड़ सकना।
(7) ईशित्व = पदार्थों की उत्पत्ति, विनाश क्षमता। शासन करने का सामर्थ्य। जैसे विश्वामित्र ने त्रिशंकु को, स्वर्ग भेजा। नारियल विश्वामित्र का अधूरा नर है।
ईशित्व, यानि शासन करने की क्षमता। दबाव में किसी को पकड़ नहीं सकते। शासन प्रेम का ही होना चाहिये। दमन पत्नी पर भी नहीं कर सकते।
शरीर के नौ दरवाजे हैं। वायुरूपी जीवात्मा फिर भी बाहर नहीं जाता, यह परमात्मा का शासन है।
(8) वशित्व = सर्व प्रभुता। दूसरे को वश में कर सकना, जैसे कृष्ण कहे जैसे सारे गोकुलवासी करें। गोवर्धन पूजा शुरू की, इन्द्रपूजा छुड़ा दी। वशित्व यानि दूसरे के हृदय में प्रवेश करना। हस्तमिलाप होता है लेकिन हृदय मिलाप नहीं होता। हनुमानजी हर एक के हृदय में प्रवेश कर गए और राम हनुमानजी के हृदय में।

निधियाँ नौ हैं :
(1) महापद्म

(2) पद्म

(3) शंख

(4) मकर

(5) कच्छप

(6) मुकुंद

(7) कुंद

(8) नील

(9) खरब

एक संत कहते हैं -नौनिधियाँ संज्ञावाचक है। ये नौ प्रकार के वैभव है। जिन्हें ये मिले हों उन पर भगवान प्रसन्न रहते हैं।
1. संतान अच्छी होना।
2. पत्नी ही प्रियतमा होनी चाहिये। पति-पत्नी एक दूसरे के मित्र हैं। हंसती हुई पत्नी को देख पति की थकावट दूर हो जाती है।
3. प्रसन्न मुख स्वामी या सेठ मिलना वैभव है। प्रसन्नमुख स्वामी मिले तो कर वेतन भी ले लो क्योंकि उसमें मन नहीं भरता। जैसे द्रोण ने दुर्योधन की नौकरी की।
4. स्नेह से भरा मित्र होना चाहिये, जिससे कुछ छिपा न हो।
5. अवंचक परिजन विश्वास पात्र नौकर।
6. क्लेश रहित मन।
7. अच्छा चेहरा भगवान का एप्रिसिएशन लेटर है।
8. स्थिर वैभव - न्याय से आया हुआ धन स्थिर होता है।
9. विद्या से सुशोभित वाणी।
हनुमानजी ने इन शक्तियों का प्रयोग केवल अपने अराध्य स्वामी श्री रामचन्द्र जी की कार्यपूर्ति हेतु ही किया।
हनुमानजी जन्म से ही अष्ट सिद्धियों के मालिक हैं और कृपा करके माँ जानकीजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि मारूति जिसे चाहें उसे ये आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ दे सकने में समर्थ होंगे। अपने भक्त पर प्रसन्न होने पर हनुमानजी सिद्धि और निधि जो भी चाहता है वह उसे दे देते हैं। कई लोन लेकर पास रख लेते हैं देते नहीं। हनुमानजी में देने की क्षमता है।
माँ के वरदान में कमी नहीं होती। लोभी से समाज नष्ट हो जाता है। माँ पर विश्वास रखने वाला ही उदार हो सकता है। भगवान पर विश्वास हो तो ही दातृत्व आता है। यह हaजारों हाथों से देता है। दान व्यर्थ नहीं जाता। दान से पुण्य प्रास होता है।
एक संत कहते हैं - हनुमानजी क्या नहीं दे सकते हमें? धन सबको चाहिये। लेकिन धन एक जगह नहीं रहता। धन बुरी चीज नहीं। हमारे ऋषियों ने कहा कि यदि बुरे ढंग से कमाकर बुरे काम में वापरते होंगे तो वह धन बुरा है। लक्ष्मी को हमारे यहाँ माँ माना है। दीवाली यानि लक्ष्मी पूजा। धन में शक्ति है। धन को इस नारी (लक्ष्मी) के रूप में पूजते हैं।
लक्ष्मी के दो लक्षण हैं- चंचल और चपल। चपलम् यानि एक जगह टिकती नही और चंचल यानि आ गई तो डोलती है। धन किसी के पास रहता नहीं इसलिये नारी का रूप दिया। जब आती है तो सुंदर साड़ी पहनकर छम-छम करती आती है। वह तो दुनिया की रानी है, पल्लू लटकता रहता है। अत: जाती है तब झाडू लगाने की भी जरूरत नहीं। पल्लू से जो लाई वही नहीं जो घर में है वह भी साथ लेकर जाती है। लक्ष्मी माँ है रखेल नहीं। माँ समझेंगे तो होटल में नचाएंगे नहीं, घोड़े पर (रेस में) लगाएंगे नहीं। सीता की खोज में रावण भी गया और हनुमानजी भी गए। हनुमानजी माता के रूप में ढूँढने गए तो उनहें अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता का आशीर्वाद मिला। यदि हम धन को अपने लोभ के लियें रखेंगे तो जला देगा। रावण की लंका तो बड़ी थी उसे भी जला दिया तो हमारी क्या बात है।
जिसने भगवान नारायण को हृदय में रख लिया उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ेगी। रावण ने नारायण से छुड़ाकर अपने उपभोग के उद्देश्य से लक्ष्मी (सीता) को रखा तो लंका जल गई।
जो दूसरों की सेवा करता है उसके हृदय में भगवान बसते हैं। तब लक्ष्मी आती रहती है। हमारे पास जब लक्ष्मी आती रहे तब देते रहें, देते रहें। नदी में पानी आता रहता है क्योंकि वह बहती है। तालाब में नहीं आता क्योंकि वह देता नहीं। लक्ष्मी उसका पीछा करती है जो नारायण की सेवा करता है जो भी अधिक हो वह सेवा में लगाओ। जितना देते हैं उससे ज्यादा मिलता है। हनुमान जी राम सेवा हेतु लक्ष्मी (सीता जी) के पास गए तो उन्हें अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता बना दिया। लक्ष्मी को संभाल कर रखोगे तो भागेगी, बांटोगे तो पीछे आएगी। जिसको जितना चाहिये उससे ज्यादा दे दो, वह आपका हो जाएगा। माँ देती ही रहेगी।

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