चौपाई संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ।। ३६।।
चौपाई संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ।। ३६।।
हनुमान चालीसा या हनुमान अष्टक पढ़ने मात्र से ही संकट दूर हो जाते हैं।
शनि के प्रकोप से बचाव के लिये हनुमान जी की भक्ति उत्तम है। संजीवनों लेने जब हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत से लौट रहे थे तो रावण ने उन्हें वहीं रोके रखने के लिए शनि को पीछे लगा दिया लेकिन हनुमान जी ने बुद्धि और बल से शनि को अपने पैरों के नीचे कुचलकर बांध दिया। शनि ने हार मानकर छोड़ देने की याचना की तब हनुमान जी ने कहा कि तुम इस शर्त पर बच सकते हो कि जब कोई व्यक्ति राम नाम का जय करे तो तुम उसे परेशान नहीं करोगे।
यदि किसी बड़े आदमी के साथ अपना व्यक्तिगत संबंध हो तो उसके द्वारपाल हमें बाधा रूप बनने के बजाय नमस्कार करके सीधे उस व्यक्ति को मिलने जाने देते हैं। इसी तरह हनुमान जी की सेवा से कोई बाधा या संकट हो तो वह कट जाता है। भाग्य के देव विधाता भी अड़चन पैदा नहीं करते।
इसके पहले की चौपाई में तुलसीजी ने कहा "संकट ते हनुमान छुड़ावै" जब कि यहाँ कहते हैं "संकट कटै मिटे सब पीरा।"
हनुमान जी संकट से छुड़ाते है और हनुमान जी का स्मरण संकटों को काट देता है। शब्दों के प्रयोग पर विचार करने पर मालूम होता है कि छुड़ाया हो तो संकट फिर दुबारा भी आ सकता है।' छुड़ावै' कहकर तुलसी जी आधि भौतिक संकट से छुड़ाने के लिए निर्देश कर रहे हैं। दुनिया की उपाधियों से हनुमान जी छुड़ाते हैं।
इस चौपाई में 'संकट हरे' कहा है। ये संकट आधि देविक है।
विधाता ने जो भाग्य में लिखा है वह मिथ्या नहीं होता।
मेटे काहूके मिटै ना विधना के अंक । राई घटै ना तिल बढै रहू रे जीवन निशंक ।।
परन्तु हनुमान जी विधि के लेख को भी काटने में समर्थ हैं । मानस कहती है, 'भविहु मेटी सकै त्रिपुरारि।' इसलिए भाग्य में संकट लिखा हो तो भी हनुमानजी की शरण में जाने से वह नष्ट हो जाते हैं। जन्म कुंडली की दुर्भाग्य की रेखा कट जाती है। मूल से ही नष्ट हो जाती है। भाग्य बदल आता है। शारीरिक या मानसिक संकट शेष नहीं रहता।
छुड़ाए हुए संकट वापस आ सकते हैं परन्तु संकट निर्मल हो जाने से उन्हें भोगना नहीं पड़ता।
'मिटे सब पीरा' जन्मना-मरना, फिर जन्मना। यह जन्म मरण का फेरा आध्यात्मिक संकट है। किसी-किसी जगह "मिटै भव भीरा" शब्द है। दोनों शब्दों का एक ही अर्थ होता है। संसार बन्धन से मुक्ति दिलाने की ताकत हनुमानजी में है।
गंगा सागर में मिलने जाती है पर रास्ते में कितने ही पाप-ताप संताप का निवारण करती जाती है। इसी तरह आत्म स्वरूप में स्थित हनुमानजी राम सेवा के एक अंग के रूप में संसार में बद्ध भक्तों को मुक्ति दिलाते हैं।
अन्य देवी-देवता भोग पदार्थ दे सकते हैं, पीड़ा या भव बंधन से छुटकारा नहीं दिला सकते। मुक्ति सिर्फ परमात्मा राम दे सकते हैं और प्रभु श्री राम हनुमानजी के वश में हैं। इसलिये वे प्रभु को कहकर शरणागत जीवन को मुक्ति दिलाते हैं। संसार में आवागमन को मिटा देते हैं। अध्यात्म-संकट को काट देते हैं।
जप और सुमिरन में फर्क है। जप करना पड़ता है। उसके लिये स्थान और समय निश्चित करना पड़ता है और माला गिनती की आवश्यकता पड़ती है।
सुमिरन एक अवस्था है। इसमें भक्त को भगवान को याद नहीं करना पड़ता। प्रभु स्वयं उसके पास रहते हैं। उसके विचारों में, क्रिया में वाणी में प्रकट होते हैं।
धन, स्वजन, विद्या, प्रभाव, साधना, तेज सौंदर्य आदि बारह सामग्री जीव के पास होते हुए भी यदि जीवन में भक्ति नहीं हो तो ईश्वर उनके आंगन में नहीं आते। शबरी के पास क्या था? श्वासोश्वास सुमिरन यह ईश्वर को बुलाने की योग्यता है।
धन संपत्ति यदि भगवान को रिझा सकते होते तो इसकी एजेन्सी अमेरिका जैसे धनी देश ने कभी से ले ली होती। रावण सोने की लालच देकर हनुमानजी को वश कर लेता। रावण का सोना हनुमानजी के लिए मिट्टी बराबर है।
आकृति सुंदर हो पर कृति विकराल हो तो ईश्वर उसके आंगन में नहीं आते। संत और भगवंत आचार-विचार, स्वभाव, मनोवृत्ति देखते हैं, रूप और दिखावा नहीं।
हमें ईश्वर को याद करना पड़ता है, गोपियाँ कृष्ण को भूलने के लिए प्रयत्नशील रहती थी। चित्त जिनसे क्षण भर भी अलग नहीं हो सके ऐसी सुमिरन बन जाती है।
हनुमानजी बलवानों में वीर हैं। जिस भक्त के सुमिरन में हनुमानजी इस तरह छा जाते हैं उसे कोई पीड़ा या कष्ट नहीं होता।
साधना करना अर्थात जो नहीं मिला उसके लिये पुरुषार्थ करना। भजन करना अर्थात जो मिला वह उसका रसास्वादन करना। हनुमानजी का भजन-सुमिरन रस-रूप परमात्मा का संयोग करा देता है।
हनुमान जी के स्मरण से सब संकट कट जाते हैं। हनुमानजी हमारे साथ हैं तो हमारे भय निकल जाते हैं समस्या सुलझ जाती है। संकट शारीरिक होते हैं, समस्या मानसिक होती है। उपासना पीड़ा नष्ट कर देती है।
एक संत कहते हैं, जो कष्ट में हनुमानजी का स्मरण करते हैं उन्हें शनि और मंगल भी कष्ट नहीं देते। हमारे बुरे कार्य एक साथ उभर आते हैं उन्हें भुगत लेना चाहिए। रावण ने तो नवग्रह और सब देवताओं को वश में कर रखा था और नवग्रह पर तो आसन लगाकर बैठा था। हनुमानजी ने रावण को समझाया, नहीं समझा तो पूंछ से उसके आसन को हिलाया तो शनि और मंगल उठकर रावण पर बैठ गए। शनि और मंगल ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि आपको जो याद करेंगे उनका हम अनिष्ट नहीं करेंगे। मन शांत होने पर शारीरिक और मानसिक पीड़ा कट जाती है।
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