चौपाई - तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा ।। १६ ।।

चौपाई - तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, 
            राम मिलाय राजपद दीन्हा ।। १६ ।।
हनुमान जी ने ही सुग्रीव को राम से मिलाकर राजा बनाया।

"राजते इति राजा" राजा बनना जिम्मेदारी का विषय है। सत्ता भोग के लिए नहीं सेवा के लिए मिलती है। राजा से समाज की शोभा बढ़ती है। सुग्रीव की खूब सहायता की। उस पर उपकार किया है। किसी को भगवान से मिला देने से बड़ा कोई उपकार नहीं।
रामचरित मानस के अनुसार जीव की तीन कक्षाएँ हैं :-
1. विषयी - वे जीव जो न तो भव पार उतरे हैं और न ही भव पार जाने की इच्छा रखते हैं। सुग्रीव इस कक्षा में आते हैं। वे भोगवादी विचारधारा वाले जीव हैं।
12. साधक - ऐसे जीव भवपार जाना चाहते हैं लेकिन किनारे पर खड़े होकर नौका की प्रतीक्षा करते हैं। विभीषण इस कक्षा (साधक अवस्था) में जीते हैं। भवपार जाने के लिए सद्‌गुरु की उनके जीवन में कमी है।
3. सिद्ध - ऐसे बड़भागी संत जो नाव में बैठकर भवपार हो गए हैं। संत भरत की गणना इस कक्षा में होती है।
सुग्रीव के जीवन में प्रभुप्राप्ति कर सकें, जैसा एक भी गुण नहीं दिखता। भाई के साथ झगड़ा होने पर भागकर ऋष्यमूक पर्वत पर आश्रय लेते हैं। कभी राम जप नहीं करते।
जब राम लक्ष्मण सीताजी को खोजते हुए ऋष्यमूक पर्वत की तलहटी में आते हैं तो सुग्रीव शंका करते हैं कि कहीं बाली ने उन्हें मारने के लिए तो उनको (राम लक्ष्मण को) नहीं भेजा? ऐसे भीरू, संशयी और संसार में रमणशील सुग्रीव में कौनसा गुण था कि जिस कारण राम ने उसे अपना मित्र बनाया। ज्ञान, भक्ति, साधना, कर्म के अभाव होते हुए भी सुग्रीव तिर जाते हैं। इसके पीछे हनुमान तत्व ही कारण है। सुग्रीव हनुमान जी का आश्रय लेते हैं। सुग्रीव का हनुमान जी पर भरोसा है। बाकी के साथ झगड़ा होने पर सुग्रीव किष्किंधा छोड़ देते हैं पर हनुमान जी सुग्रीव का साथ नहीं छोड़ते। हनुमान जी भगवान राम से विनती करते हैं कि "आप सुग्रीव को अपनाओ वह दीन है उसके साथ मित्रता करके उसे बालि के भय से मुक्त करो।" कोई बीमार पड़े तो डॉक्टर के पास जाता है पर बीमारी बढ़ जाय तो डॉक्टर स्वयं दर्दी के पार जाकर इलाज करता है। आप कृपा करके मेरे साथ चलो और सुग्रीव का ईलाज करो प्रभु राम हनुमान जी की बात मानकर अग्नि की साक्षी में सुग्रीव से मित्रता कर, बाली का वध करके सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाते हैं।
मित्रता में समता होती है, सौंपना होता है जैसे सुदामा की मैत्री, सुग्रीव को मैत्री। जीव दुःख निवृत्ति और सुख प्राप्ति के लिए आश्वासन चाहता है। जो ये मनोकामना पूरी कर दे वही व्रत, वही उपासना, वही संत प्यारा लगता है।
"सखा सोच त्यागहू बल मोरे, सब विधि घटब काज में तोरे ।।"
सुग्रीव का जन्म सूर्यनारायण के अंश से हुआ। सूर्यदेव में हनुमान जी को विद्या में पारंगत बनाने के बाद गुरु दक्षिणा में सुग्रीव की रक्षा की जवाबदेही मांगी। हनुमान जी ने वचन दिया और उसे निभाया।
भोगवादी ठाटबाट, रजोगुण प्रिय होते हैं इसलिए श्री राम सुग्रीव को राजा बनाते हैं। राम और सुग्रीव को मिलाने में हनुमान जी ने मध्यस्थता करके सुग्रीव को लौकिक और पारलौकिक दोनों सुख प्राप्त कराए हैं। इस प्रकार हनुमान जी ने जीव को शिवतत्व के साथ जोड़कर सूर्यदेव को गुरु दक्षिणा दी है।
एक संत कहते हैं सुग्रीव की पत्नि रूमा को बालि और सीता जी को रावण ले गया। दोनों की (सुग्रीव और राम की) एक जैसी स्थिति है अतः दोस्ती करा दी।
सुग्रीव बालि के डर से हनुमान और जामवंत के साथ दुनियाँ में भागता फिरा राम ने पूछा हनुमान जी से कि सुग्रीव को GEOGRAPHY का बहुत KNOWLEDGE है तो हनुमान जी ने कहा यह BEST TRAVEL AGENT हो सकता है।
ऋष्यमूक पर्वत पर मतंग ऋषि के श्राप से बालि नहीं आ सकता था। राम लक्ष्मण को आते देख सुग्रीव डरा कहीं उन्हें बालि ने तो नहीं भेजा है और भागने लगा तब जामवंत ने कहा, भागते क्यों हो।
पहले पहचान तो करो हमेशा अच्छे बुद्धिमान और वीर का संग करना चाहिये। जीवन में कई अवसर (OPPORTUNITIES) आते है, लेकिन हम उने पहचानते नहीं। सुग्रीव का हनुमान में विश्वास था। वह बोला तुम बटुक का रूप लेकर जाओ ओर खतरा हो तो ईशारा करना, मैं भाग जाऊंगा। हनुमान जी गए भगवान से उनका तो मिलाप हो गया।
लेकिन उनकी करूणा देखो। गंगा भी हिमालय से निकल गंदगी ले सागर में चली जाती है। हनुमान जी को लगा मुझे जो मिला दूसरों में भी बाँटू। हनुमान जी ने कहा प्रभु सुग्रीव आपका दास है। आप उसका काम करो, वह आपका काम करेगा। राम ने कहा बुलाओ उसे। हनुमान जी ने सोचा ईशारा करूंगा और उसकी समझ में नहीं आया तो भाग जाएगा। बड़ी मुश्किल से तो जीव उपर उठता है उसे क्यों नीचे लाते हो। तब राम और लखन दोनों को ऊपर उठाकर ले गए और सुग्रीव से मिला दिया।
सुग्रीव कौन है? जीव। जीव डरा-डरा सा रहता है। दिन भर मरने का डर। जीव के पीछे बालि यानि हमारा कर्म। जो कर्म किये उनका फल कहीं भी भागकर जाओ पीछा करेगा ही। इसलिए जीव हमेशा भागते रहता है। लेकिन ऋष्यमूक पर्वत (रिषि मुख) संत के सामने सतसंग में बैठते हैं तब तक कर्मफल पीछा नहीं करता। तब तक वह चप्पल (बालि) पर बैठा रहता है। कोई चप्पल चुरा लेगा तो ठीक हुआ समझो। जब तक हम सतसंग में हैं कार्य-फल सता नहीं सकता। जब तक गुरु हनुमान जी तबतक हमारा बालि पीछा नहीं कर सकता। जिसने राम से मिलाकर कर्मफल-रूपी बालि का नाश कर दिया ऐसे गुरु हनुमान जी को प्रणाम है।

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