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कंचन बरन विराज सुबेसा, कानन कुंडल कुंचित केसा।।४।।

चौपाई - कंचन बरन बिराज सुबेसा,            कानन कुंडल कुंचित केसा ।।४।। सोना तपने पर कंचन होता है। "स्वर्ण शैलाभ देहं"। हनुमान जी का शरीर तपे हुए सोने के समान है। तप का अर्थ है शुभ नियम के पालन में जीवन लगा देना। हनुमान जी का पूरा जीवन राम के काम में लग गया। रावण की लंका सोने की, घर भी सोने का। कांचन मृग पालता है। साखामृग बंदर को कहते हैं। एक कंचन ने दूसरे कंचन को जला दिया। हनुमान जी ने लंका जला दी। असली नकली का फर्क मालूम पड़ गया। पावक (अग्नि) असली नकली की परीक्षा करती है। जानकी जी को नहीं जलाया। बजरंग बली का वर्ण सोने जैसा है। सोने में चमक होती है। ब्रह्मचर्य से शरीर का तेज निखरता है। हनुमान जी प्रभु राम का सोना है जबकि मारीच रावण का सोना है। सोने की परीक्षा चार प्रकार से होती है। (1) छेद कर। (2) टीपकर। (3) घिसकर। (4) अग्नि में तपाकर रावण का कनक मृग मारीच बाण से छिदगया तब अपने मूल राक्षस रूप में प्रकट होगा गया। स्वर्ण चर्म के नीचे छिपी उसकी राक्षसी वृत्ति बाहर आ गई। जबकि हनुमान जी "कनक भूधराकार शरीरा" है। रावण द्वारा उनकी पूंछ में आग लगाई गई तो सारी लंका ज...