चौपाई प्रभु मुद्रिका मेलि मुख महिं, जलधि लाँघि गए अवाज नाहिं ।। २८ ।।
चौपाई प्रभु मुद्रिका मेलि मुख महिं,
जलधि लाँघि गए अवाज नाहिं ।। २८ ।।
राम तो वनवासी, वल्कल वेशधारी थे, उस समय उनके पास मुद्रिका कहाँ से आई? जब केवट ने गंगापार कराई तब भगवान को केवट को उतराई देने का विचार आया तो तुरंत सीता जी ने अपनी मुद्रिका उतारकर श्री राम के हाथ में रख दी। केवट ने उतराई नहीं ली और तब से वह मुद्रिका श्री राम के पास थी।
सीताजी हनुमान जी को पहचान सके इसलिए श्री राम वह मुद्रिका हनुमान जी को देते हैं। जब हनुमान जी मुद्रिका सीताजी को देते हैं तो सीताजी प्रसन्न होकर पूछती हैं, बेटा! इतना विशाल समुद्र तूने पार कैसे किया? श्री हनुमान जी ने नम्रतापूर्वक कहा कि इस मुद्रिका में राम नाम अंकित है। इस रामनाम के प्रताप से उड़कर में लंका पहुँच गया। रामनाम की महिमा कौन नहीं जानता? रामचरित मानस में कहा है :-
नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं, करहु विचार सुजन मन माहिं ।।
राम नाम भव सागर को भी सुखा देने में समर्थ है तो यहाँ तो केवल सागर ही तो पार करना था।
1. हनुमान जी ने मुद्रिका को मुँह में रखी। कथाकार विनोद में कहते हैं कि हनुमान जी ने वानर देह धारण किया है इसलिए जेब नहीं थी मुद्रिका हाथ में रखने पर - कूदते समय गिर जाने के डर से उन्होंने उसे मुँह में रख लिया।
2. आध्यात्मिक दृष्टि से मुद्रिका को मुँह में रखना अर्थात् रामनाम का निरंतर जप करना। मुद्रिका पर राम नाम अंकित है। जो श्वासो श्वास राम नाम का जप करता है वह निश्चित रूप से भवसागर पार कर लेता है। बुद्धिमान हनुमान जी ने राम नाम रखने का उचित स्थान भक्तों को बताया है।
3. रा और म ये दो अक्षर हनुमान जी के दो पंख हैं। इन पंखों से उड़कर उन्होंने समुद्र पार कर लिया।
मंदिर में भगवान की मूर्ति को पुष्पमाला अर्पण करने का अधिकार पुजारी को होता है। दूसरो को वहाँ पहुँचना मुश्किल होता है। परन्तु राम नाम के जप में ऐसी कोई कठिनाई नहीं होती। देव गुरु बृहस्पति से लेकर रावण जैसे राक्षस को भी नाम जप करने का समान अधिकार है। पूजन, आचार विचार, वेशभूषा आदि की टीका, आलोचना हो सकती है परन्तु नाम जप की नहीं।
नाम जप, "सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू।" है।
अनेक रामायणी और कथाकार आज भी रामनाम के बल पर समुद्र पार करके विदेशों में पहुँचते हैं। ऐसे व्यक्ति सारे विश्व में सम्मान पाते हैं।
वापस लौटते समय श्री सीता जी हनुमान को चूड़ामणि प्रभू राम को देने के लिये देती है जिससे प्रभु को मालूम हो जाय कि हनुमान जी सीता जी को मिलकर आए हैं।
एक संत कहते हैं एक बार इन्द्र ने सभा आयोजित की जिसमें सब देवताओं को और पृथ्वी लोक से जनकजी को भी निमंत्रित किया। वापस लौटते समय इन्द्र ने सबको उपहार दिये। जनक जी को एक चूड़ामणि दी। जनकजी ने कहा प्रभु की कृपा से मेरे भंडार में कई रत्न है, आभूषण है यह आप और किसी को दे दीजिए। इन्द्र ने आग्रह पूर्वक कहा यह साधारण चूड़ामणि नहीं है, आप रखिए। जनकजी ले आए और ब्याह के बाद यह चूड़ामणि जनक जी ने सीताजी को आयोध्या जाते समय दी। इस चूड़ामणि का ऐसा प्रभाव था कि जब तक वह जिस राज्य में रहेगी उस राज्य के राजा की मृत्यु नहीं होगी। वनवास का आदेश होने पर जब तक सीता जी आयोध्या के बाहर नहीं निकली तब तक दशरथ ने प्राण नहीं छोड़े। अब सीता जी अशोक वाटिका में बैठी है चूड़ामणि उनके पास है। वह सीताजी ने हनुमान जी को दे दी उसी समय रावण की मृत्यु निश्चित हो गई और चूड़ामणि राम के पास पहुँच गई। रामायण में शक्ति है और भक्ति के साथ युक्ति भी है।
एक संत कहते हैं हनुमान समुद्र कूद गए कारण राम की मुद्रिका मुँह में थी यानि राम का नाम। हनुमान जी ने कहा इसमें विशेषता मेरी नहीं राम की है, कारण अहंकार न आ जाए पर यह काम करने के बाद करना चाहिये। बिना पढ़े पास नहीं होते अतः पास होने के बाद कहें संत के आशीर्वाद से पास हो गए। हमें आशीर्वाद का MISUSE नहीं करना चाहिये। सागर कूदने के बाद हनुमान जी कहते हैं।
मिलने पर प्रभुराम ने जब हनुमान जी को बहुत प्रशंसा की है, तब हनुमान जी कहते हैं :-
मणि मुदरी उस पार भये, चूड़ामणि यही पार।
सीय विरह लंका जली, और प्रताप तुम्हार ।।
हे भगवन आपके प्रताप से, रावण के पाप से माँ जानकी के संताप से और मेरे पिता (पवनदेव) ने लंका को भस्मसात कर दिया। इसमें मैं किस बात का गर्व करूं। श्री हनुमान जी की यहाँ विनम्रता प्रकट हुई है। सब कुछ करने पर भी यश श्री राम जी को देते हैं। हनुमान जी का चरित्र भक्तों को इस प्रकार राम कार्य करने की प्रेरणा देता है।
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