अतुलित बलधामम्- श्री हनुमान चालीसा विवेचन
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। अर्थात ् तुलसीदास जी श्री गुरु के चरण को कमल के उपमा देते हैं लक्ष्मी हमेशा कमल में निवास करती है फिर भी कमल असंग रहता है कीचड़ में जन्म लेने पर भी कीचड़ और जल से अलिप्त रह कर कमल ऊपर उठ जाता है और देव पूजन में समर्पित हो जाता है । गुरु भी संसार में रहते हुए स्वयं अलिप्त रहता है । धन वैभव सुख सुविधाओं के मिलने पर भी आप अलिप्त रहता है और इतना ही नहीं अपने निष्ठावान शिष्य को अपने समन क्षमतावान बना देता है। इस दोह में यह स्पष्ट किया कि धूल की कोई कीमत नहीं होती लोगों की ठोकरे खाती है और पानी के साथ मिलकर कीचड़ बन कर लोगों को कष्ट देती है परंतु वही धूल जब गुरु के चरणों के संपर्क में आती है तो वह मस्तक पर लगाने लायक बन जाती है अर्थात दूसरों को शुद्ध करने वाली बन जाती है। श्री गुरु के चरणों की धूल जब मस्तक पर कोई लगाता है तो उसका मन रूपी दर्पण साफ होता है। धूल की कोई कीमत नहीं होती। लोगों की ठोकर खाती रहती है। पानी के साथ कीचड़ बनकर लोगों को कष्ट देती है। हवा के साथ मिलने ...