अतुलित बलधामम्- श्री हनुमान चालीसा विवेचन
श्री गुरु चरण सरोज रज,
निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु,
जो दायकु फल चारि।।
अर्थात ् तुलसीदास जी श्री गुरु के चरण को कमल के उपमा देते हैं लक्ष्मी हमेशा कमल में निवास करती है फिर भी कमल असंग रहता है कीचड़ में जन्म लेने पर भी कीचड़ और जल से अलिप्त रह कर कमल ऊपर उठ जाता है और देव पूजन में समर्पित हो जाता है । गुरु भी संसार में रहते हुए स्वयं अलिप्त रहता है । धन वैभव सुख सुविधाओं के मिलने पर भी आप अलिप्त रहता है और इतना ही नहीं अपने निष्ठावान शिष्य को अपने समन क्षमतावान बना देता है। इस दोह में यह स्पष्ट किया कि धूल की कोई कीमत नहीं होती लोगों की ठोकरे खाती है और पानी के साथ मिलकर कीचड़ बन कर लोगों को कष्ट देती है परंतु वही धूल जब गुरु के चरणों के संपर्क में आती है तो वह मस्तक पर लगाने लायक बन जाती है अर्थात दूसरों को शुद्ध करने वाली बन जाती है। श्री गुरु के चरणों की धूल जब मस्तक पर कोई लगाता है तो उसका मन रूपी दर्पण साफ होता है।
धूल की कोई कीमत नहीं होती। लोगों की ठोकर खाती रहती है। पानी के साथ कीचड़ बनकर लोगों को कष्ट देती है। हवा के साथ मिलने पर गगन विहार करती है और वहीं गुरु चरणों का आश्रय लेने पर महत्त्वपूर्ण हो जाती है। तुलसी इस धूल से अपने मन रूपी दर्पण को साफ करना चाहते हैं।
दर्पण - मैं जो देखता हूँ उसके वास्तविक स्वरूप को दिखाता है। दर्पण मैला होतो प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं दिखता। मन रूपी दर्पण को सुधारना अर्थात् मन के अज्ञान को, मन पर लगे विषय भोगों के मैल को दूर करना। मन साफ न हो तो आत्मदर्शन नहीं हो सकता।
दूसरे को देखने के लिए दृष्टि पर्याप्त रहती है परन्तु स्वयं को देखता हो तो दृष्टि के साथ दर्पण भी चाहिए। मन दर्पण है और बुद्धि दृष्टि है। मन रूपी दर्पण को साफ करने के लिए गुरुचरणरज पावडर का काम करती है और दृष्टि निर्मल करने
के लिए रज काजल या सुरमे का काम करती है। चरणरज ऐसी दृष्टि प्रदान करती है जिससे मन दर्पण में देखने पर मन में भरे हुए दोष नजर आते हैं जिन्हें देखकर हम अपनी कमियाँ दूर कर सकते हैं।
गुरुदेव को हम प्रणाम करते हैं तब उनकी चरणरज मस्तक पर लगाते हैं मन पर तो चरण रज लगा नहीं सकते। लेकिन उसका प्रभाव मन पर भी होता है। जैसे बिजली के खुले तार पर हाथ छू जाने पर मन भी झटके से शरीर के साथ व्यथित हो जाता है उसी तरह चरणरज मस्तक पर लगाने पर शरीर के साथ-साथ मन भी शुद्धता की अनुभूति करता है।
मन स्वच्छ हो, मन से विषय भोग दूर हो तो हनुमान जी को वहाँ विराजमान कर सकते हैं। जगह खाली हो तो ही कोई वहाँ आ सकता है। माँ जिस प्रकार पिता का परिचय कराती है वैसे ही सद्गुरु ईश्वर का परिचय कराता है।
एक संत ने कहा है यदि हम सफलता पाना चाहते हैं तो बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए, बराबर वालों की शुभकामना और छोटों का प्यार होना चाहिए।
आशीर्वाद लेने से अहंकार मिट जाता है, गुरु वन्दन से अहंकार मिट जाता है। माता-पिता शरीर का दान करते हैं, गुरु चरित्र गठन करता है। गुरु के आगे श्री लिखा। श्री यानि शोभा। सब गुरु श्री नहीं होते, चरित्रवान नहीं होते। श्री अर्थात् जो सुशोभित है, निष्ठावान है, चरित्रवान है। मुकुर अर्थात दर्पण। दर्प अर्थात् अहंकार। हमारा मन दर्पण की तरह है। गुरु की चरणरज से मन के दर्पण को साफ करता हूँ। परमात्मा भी जिसकी पूजा करता है उसका नाम गुरु है। कृष्ण भी सांदीपनी के आश्रम में गए। जहाँ अपूज्य की पूजा और पूज्य की अवहेलना होती है वहाँ दुर्भिक्ष्य, मरण और भय होता है। आदमी निस्तेज हो जाते हैं। गरिमा से गौरव से युक्त को गुरु कहते हैं। जो निरपेक्ष, मुनि, निर्वैर, शांत, समदर्शी हैं उसके पीछे भगवान भी भागते हैं।
निरपेक्ष अर्थात जो किसी से अपेक्षा नहीं रखते और किसी की उपेक्षा भी नहीं करते।
मुनि - जो मननशील है। मौन की महिमा को जानता है।
शांतम् - जो स्वयं शांत है वही शांति दे सकता है। जीवन की भीतरी परितृप्ति से पैदा हुई शान्ति है।
निर्वैरम् - शत्रु भी उनके हो जावें। राम और महावीर के भी शत्रु थे परन्तु उनके मन से शत्रुभाव चला गया वे अजातशत्रु होते हैं। अजातशत्रु अर्थात अपने मन में शत्रुभाव पैदा नहीं होने देते। जो शत्रु का रूपांतरण मित्र में कर देता है वहीं निर्वैर है।
समदर्शनम् - जहाँ कोई पक्षपात नहीं। उसके लिये सारी पृथ्वी परिवार है।
भगवान ऐसे भक्तों की चरणरज अपने सिर पर लगाते हैं। हमारा मन दर्पण की तरह है, उसमें परमात्मा का प्रतिबिम्ब होना चाहिए। यदि उस पर धूल चढ़ जाए तो अन्दर बैठे हुए परमात्मा का प्रतिबिम्ब नहीं दिखता। और इस दर्पण को साफ करने का एक ही रास्ता है। गुरु का स्मरण ही वह रज है जो मन को साफ करता है। 'गु' अर्थात् अंधकार और 'रु' अर्थात् रोशनी। जो अंधकार को दूर कर दे। कोई भी ज्ञान किसी के माध्यम से मिलता है। माँ से, पिता से, शिक्षक से। तो अध्यात्म में भी तो गुरु की जरूरत है। मंत्र प्रदाता दीक्षा गुरु कहलाता है। जिन्हें केवल परमात्मा ही चाहिए वे श्री गुरु के पास जाते हैं। जो सबसे ऊँचे गुरु हैं, जो अनेक जन्मों के बंधन से, कर्म बन्धनों से, दुःखों से मुक्ति दे, आत्मज्ञान दे वही श्री गुरु है ऐसा पद्मपुराण में कहा है।
गुरु के चरणों को कमल क्यों कहा। सरोज अर्थात् कमल। कमल का अर्थ कोमल नहीं। कमल वह फूल है जो कीचड़ में पैदा होता है और कीचड़ की शोभा बढ़ाता है। वहीं आत्मा, ब्रह्म का प्रतीक है। इस गंदे शरीर में रहकर भी जगत को धारण करके भी जो मैला नहीं होता वह परमात्मा है। जो इस शव को शिव बनाता है।
श्री गुरु गरिमामय है। गुरु भगवन्निष्ठा बढ़ाते हैं। गुरु के चरण सत्य के प्रतीक हैं इसलिए गुरु चरणों में सिर झुकाते हैं क्योंकि ज्ञान सिर में चाहिये।
गुरु जब यह श्लोक बोलता है कि :
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ।। अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश गुरु हैं।
और शिष्य जब बोलता है यही श्लोक तो उसका अर्थ है गुरु ही ब्रह्म है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही महेश है।
एक संत कहते हैं - मन साफ न हो, सुलझा हुआ न हो तो दूसरों को भी उलझन में डाल देता है। बहुत सी बातें मन में भावों पर टिकी हैं। छूरी यदि गुंडे के हाथ में है तो वह मारने के लिये है और यदि डॉक्टर के हाथ में है तो बचाने के लिये है। क्रिया दोनों की एक जैसी है पर भाव अलग अलग है। क्रिया का आधार भाव और भाव का आधार मन है अतः मन साफ होना चाहिये।
बरनौ रघुवर विमलयश
प्रश्न उठता है कि तुलसी जी हनुमान चालीसा में चरित्र तो हनुमान जी का लिखने वाले हैं तो फिर 'रघुवर' क्यों कह रहे हैं?
सीताराम जी ने हनुमान जी को दत्तक पुत्र स्वीकारा है। सुन्दकाण्ड में जानकीजी कहती है -
"अजर अमर गुणनिधि सुत होहू। करहीं बहुत रघुनायक पर छोहू।।"
श्री राम भी कहते हैं -
"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउ करि विचार मन माहीं।।"
हनुमान जी दोनों के दत्तक पुत्र हैं। लव कुश तो बाद में हुए इसलिए गोस्वामी जी ने उनका रघुवंश में समावेश किया है। 'रघु' अर्थात वंश परंपरा और 'वर' अर्थात् श्रेष्ठ। हनुमान जी रघुकुल में श्रेष्ठ हैं।
चरित्र लिख रहे हनुमान जी का और कह रहे हैं रघुवर। यहाँ तुलसी खो गए हैं। उन्हें लगा होगा कि यदि मैं ऐसा कहूँ कि हनुमान जी के लिये लिखता हूँ तो वे सुनेंगे नहीं। सज्जन व्यक्ति अपनी स्तुति नहीं सुनते।
दूसरी बात तुलसीजी के इष्टदेव राम हैं और हनुमान जी के भी राम हैं। उन्हें शायद ऐसा लगा होगा कि पहले यदि रघुवर का नाम लूंगा तो हनुमान जी बहुत प्रसन्न होंगे और आगे सुनने को तैयार हो जायेंगे।
उनके यश को 'विमल' कहा है। हनुमान जी के चरित्र में कोई दोष, दाग या लांछन नहीं है। उनका चरित्र परम निर्मल है। यश ईश्वर का ही दोषरहित और विशुद्ध हो सकता है। सीता, राम और कृष्ण को भी दुनियाँ ने कितने ही कलंक लगाए परन्तु हनुमान जी को कोई भी कलंक नहीं लगा सका। वे निष्कलंक हैं। जीना हो तो हनुमान जी जैसा। विमल यश से वाणी पवित्र होती है।
एक संत कहते हैं, "रघुवर कौन?" यहाँ रघुवर का अर्थ हनुमान जी ही है, राम नहीं। अयोध्याकाण्ड में रघुवर दशरथ जी को कहा, दूसरे भाग में भरत जी को रघुवर कहा और यहाँ हनुमान जी को कहा है।
पुत्र कौन? पुं अर्थात नर्क। 'पुं नाम त्रायते इति पुत्रः।' जो माता-पिता को नर्क से पार लावे। नर्क यानि दुःख। हनुमान जी ने सीता माता को ढूँढकर उनके दुःख दूर किये तो सीता माता ने उन्हें पुत्र कहा तब राम ने भी उन्हें पुत्र माना। माँ ही पहले पिता की पहचान कराती है। हनुमान जी ने पुत्र का धर्म निभाया तो रघुवंशी हुए। प्रेम का रिश्ता जन्म के रिश्ते से भी बड़ा होता है।
हनुमान जी के विमल यश का गान चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला है। परन्तु फल तो हमेशा अंत में कहा जाता है लेकिन हनुमान चालीसा में तो फल की बात शुरूआत में ही तुलसीजी कह देते हैं। कारण भक्त के यश का गुणगान तुरन्त फल देता है। भगवान से भी भक्त का विशेष महात्म्य होता है। प्रमाण है :
"मोरे मन प्रभु अस विश्वासा, राम ते अधिक राम कर दासा ।।"
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