शंकर स्वयं केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन ।। ६ ।।
चौपाई - शंकर स्वयं केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जग वंदन ।। ६ ।।
हनुमान जी शंकर जी के अवतार हैं।
"रूद्र देह तजि नेह बस, शंकर भए हनुमान।"
शंकरजी ने बंदर वेष क्यों धारण किया? भगवान को बंदर वेष पंसद है। नारद जी भगवान के पास आए और कहा
"जेहि बिधि नाथ होई हित मोरा, करहु सो बेगि दास मैं तेरा।"
भगवान ने कहा -
"जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार ।
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार ।।
मुनि हित कारन कृपा निधाना, दीन्ह कुरुप न जाइ बखाना।"
सुन्दर से बन्दर बना दिया। बंदर तो बनना ही है चाहे नारी का बंदर बनो या नारायण का बनो।
"नारि बिबस नर सकल गुसांई, नाचहि नर मर्कट की नाई ।।" या तो काम नचाएगा या राम नचाएगा। तो राम के बंदर बनकर नाचो।
छम छम नाचे, देखो वीर हनुमाना।
कहते है कोई इसे राम का दीवाना ।। राम राम, सियाराम सियाराम ।। पाँव में घुंघरू बांध के नाचे, रामजी का नाम इसे बड़ा प्यारा लागे। राम जी ने देखो इसे खूब पहिचाना ।। छम छम नाचे..........।।१।। जहाँ जहाँ कीर्तन होता सियाराम का, वहाँ वहाँ लगता पहरा वीर हनुमान का राम जी के चरणों में इसका ठिकाना ।। छम छम नाचे देखो......।। २ ।।
'शंकर स्वयं।' हनुमान जी शंकर के पुत्र नहीं, स्वयं मूर्तिमान तेज स्वरूप हैं, स्वयं शंकर हैं, माँ अंजनी के पुत्र हैं और केसरी माँ अंजनी के पति होने से हनुमान जी केसरी नन्दन कहलाते हैं।
हनुमान जी तेजपुंज है और विश्ववंद्य है। जगत हमेशा तेज और पराक्रम को पूजता है। गोस्वामी जी हनुमाजी के तेज और प्रताप को महान कहते हैं। रावण भी प्रतापी था, इंद्रादि देवता, दिग्पाल उसके दरबार में भयभीत होकर हाथ जोड़कर खड़े रहते थे। रावण का प्रताप तामसी था, आतंक युक्त था। रावण से अनेक गुणा प्रताप हनुमान जी का है परन्तु हनुमान जी का तेज सात्विक है उन्हें सुयश प्रदान है उनका प्रभाव शीतल है। रावण के सामने सब विवशता से, डर से झुकते हैं जबकि हनुमान जी की देवता अपार श्रद्धा से वंदना करते हैं।
सारा जगत हनुमान जी को वन्दन करता है जबकि रावण को धिक्कारता है। कारण उसने सीता और राम में वियोग करा दिया था। वह मानवता का भक्षक था। सारा जीवन अनीतिरत, परपीड़ादायक, रामविरोधी रहा। उसका भोजन माँस-मदिरा था। स्व सुख के लिए कुछ भी अधर्म करने में नहीं हिचकता था। ऐसे अनेक कारणों से महापंडित, महापराक्रमी, कुशल विज्ञानी होने पर भी आज लोग दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाते हैं।
दूसरी तरफ हनुमान को सब पूजते हैं कारण वे ब्रह्मचारी हैं, सीताराम के मिलन में उपयोगी हुए हैं, मानवता के रक्षक हैं, जीवन नीतिमय और विनयपूर्ण है राम के अनन्य भक्त है, सेवा के लिए अवतार लिया है, त्यागमय जीवन है।
हनुमान जी को शंकर जी से भक्ति मिली है, केसरी जी से वफादारी और पवन से विनय शीलता और सेवा का गुण मिला है। अर्थात् हमें भी शंकर, केसरी और पवन जैसे पिता बनना है। हम जो आज हैं वह माता पिता से लेकर आए हैं। GEANS रूपी जायदाद लेकर आए हैं। हनुमान जी अपने माता पिता से तेज और प्रताप लेकर आए हैं जिससे सारे जग में उनकी वन्दना होती है। राम के मंदिर में हनुमान हैं ही। परन्तु हनुमान जी के मन्दिर में दूसरे किसी की जरूरत नहीं। और सबसे ज्यादा मंदिर हनुमान जी के हैं।
तेज को ही दुनिया वन्दन करती है। तेज नष्ट होने पर मनुष्य नष्ट हो जाता है। हमारे पुरखा अग्नि की पूजा करते थे। अग्नि की ज्योति ऊपर ही जाती है। अग्नि उपयोगी है, सेवक हैं। अग्नि भोजन पका देती है सेवा करती है लेकिन उसे जेब में नहीं रख सकते। रखने पर भस्म कर देगी। गुरु लोग किसी की जेब में नहीं जाते । व्यास पीठ बिकाउ नहीं होनी चाहिये। शांत का अर्थ निस्तेज नहीं। शांति स्थायिक भाव है पर तेज नैमित्तिक भाव है, कभी भी तेज हो सकता है। शिक्षक जोकर नहीं। उसे अपनी मर्यादा संभालकर रहना चाहिये। इसलिए कहा है "आचार्य देवो भव।" मनुष्य तेजोमय होना चाहिये।
जिसकी (वासुदेव की) टोकरी में (मस्तक में) कृष्ण है उसे जगत का कोई भी जलप्रवाह (जन प्रवाह) नहीं रोक सकता उसे रास्ता मिल ही जाता है। तेजस्वी आदमी का कभी नहीं छेड़ना चाहिए। निस्तेज पति को पत्नि भी प्रेम नहीं करती। मजबूर होती है इसलिए उसके साथ जिन्दगी निकालती है। पतिव्रता है अतः छोड़कर नहीं जाती। सरिता सागर को ही समर्पित होती है, अतः पति को सागर जैसा बनना पड़ेगा। पूरा जगत तेज और प्रतापी हनुमानजी को वन्दन करता है।
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