अतुलित बालधामा ---हनुमान जी के पास दायित्व है पद नहीं।

बौपाई - रामदूत अतुलित बलधामा, 
           अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ।। २ ।।
हनुमान जी राम के दूत हैं। दुनिया में बिना पद के प्रतिष्ठा नहीं होती। पद न हो हो सामाजिक स्थान नहीं मिलता। हनुमान जी सर्वाधिक बलवान हैं लेकिन उनके पास कोई पद नहीं है। राम ने दरबार में कहा, "हनुमान विभीषण ने मेरी सहायता की तो लंका का राज्य दे दिया, सुग्रीव को किष्किंधा का, अंगद को युवराज पद दे दिया। तुमने तो सारा जीवन ही दे दिया। कोई पद ले लो।" हनुमान जी ने कहा पद नहीं लूंगा। भगवान ने बहुत आग्रह किया तो हनुमान जी बोले, "फिर एक पद से राजी नहीं होऊँगा।" श्री राम बोले, "माँग माँग कितने पद दूँ।" हनुमान जी ने राम के दोनों चरण पकड़े और कहा, "मुझे ये दोनों पद दे दीजिए।" हनुमान जी के पास दायित्व है पद नहीं।

हनुमान जी जब जानकी के पास गए तो जानकी जी ने पूछा तुम कौन हो, कहाँ से आए, तुम्हारा पद क्या है? तो हनुमान जी ने परिचय दिया "रामदूत मैं मातु जानकी, सत्य सपथ करूणानिधान की।" जानकी जी बोली तुम प्यारे से लग रहे हो, तुम दूत क्यों बने, तुम्हें तो पूत होना चाहिए। पूत का प्रमाण-पत्र तो माँ ही देगी। सीता जी ने कहा, "सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी।" जानकी ने जब भी बोला तब हनुमान जी को सुत ही बोला। जब राम के पास लौटकर गए तो राम ने भी कहा - "सुनु सुत कोहि उरिन मैं नाही, देखहु करि बिचार मन माँहि।" पूरी रामायण मर्यादा से भरी हुई है। पहले जानकी जी ने सुत कहा तब राम ने सुत कहा। पहले कह देते तो जानकी जी को भ्रम हो जाता। माँ ही जानती है पुत्र को।

जाके बल लवलेस तें, जितेहु चराचर झारि। तासु दूत मैं जा करि, हरि आनेहु प्रिय नारि ।।

दूत स्वामी के प्रति कोई भी गलत फहमी हो उसे दूर करता है और अपने स्वामी का यश बढ़ाता है फिर भले ही अपमान सहना पड़े।

जानकी जी ने कहा - "कोमल चित कृपाल रघुराई, कपि केहि हेतु धरी निठुराई । बचन न आव नयन भरि बारि, अहह नाथ हों निपट बिसारी।"

कृपालु पात्रता नहीं देखता, कृपा ही करता है। हनुमान जी ने कहा कि आपके पास क्या प्रमाण है कि भगवान ने आपको बिसार दिया? जानकी जी प्रमाण हैं। जब जयन्त ने मेरे चरणों में चोंच मारी थी तब उनके पास भी नहीं था तब तिनके का बाण बनाकर अभिमंत्रित करके बाण मार दिया। चोंच मारना बड़ा अपराध नहीं था। रावण मुझे हर लाया और वे सोए हैं। हनुमानजी ने कहा माँ बाण अभी भी मारा है और जोरदार बाण मारा है आपको दिखाई नहीं दे रहा है क्या?

"जिमि अमोघ रघुपति कर बाना,
 एहि भाँति चलेउठ हनुमाना।"

इस बार मुझे बाण बनाकर भेजा है। माँ नाराज मत होना, मेरे आगमन सूचना हो चुकी है। लेकिन कठिनाई यह है कि कठिनाई आने के पहले कृपा आ गई। भगवान से कभी भरोसा मत उठाइये और संसारी पर भरोसा मत कीजिये। यदि कोई सद्‌गुरु हमारे संपर्क में न हो तो कृपा मालूम नहीं पड़ती। इस समय जानकीजी के पास कोई संत नहीं था। दो संतों ने उन्हें एहसास कराया, हनुमानजी ने और त्रिजटा ने। बुरे से बुरे समय में भी भगवान की कृपा बनी रहती है किसी न किसी रूप में। यदि दुर्घटन में किसी की मौत होने वाली हो तो घर में किसी के पेट में बालक आ जाता है। घाटा होने जा रहा हो तो घाटा होते-होते पुराना देनदार आ जाएगा। कृपा निश्चित रूप से आती है। संकट दिखाई देता है पर कृपा दिखाई नहीं देती। रावण-संकट आया था आँखों के सामने पर कृपा अशोक वृक्ष पर थी। रावण तलवार लेकर बाद में आया था हनुमानजी उसके पहले ही आकर बैठ गए अशोक वृक्ष पर। रावण ने जैसे ही तलवार खींची सीता जी को मारने के लिये मंदोदरी ने हाथ पकड़ लिया। मंदोदरी के रूप में कृपा प्रकट हो गई। हनुमानजी कहते हैं रावण के दरबार में रावण ने मुझे मारने के लिये सबको कहा, सब मारने दौड़े पर उसी समय विभीषण आ गए "नीति विरोध न मारिय दूता" मुझे लगता है माँ आपने भगवान की कृपा और स्वभाव को बिसार दिया। भगवान का स्वभाव कैसा है-

"अति कोमल रघुबीर सुभाउ" जानकीजी ने भी यही कहा "कोमल चित कृपाल रघुराई"। हनुमानजी कहते हैं माँ आपको मुझ पर भरोसा नहीं आएगा, भगवान को ही सुन लीजिए। उनकी वाणी को तो आप पहचानती हैं न,

"रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर" मैं चुप हो जाता हूँ सीधे प्रभु की वाणी ही सुन लीजिए।
"कहेउ राम बियोग तव सीता, 
मो कहुँ सकल भए विपरीता।"

राम बोल रहे हैं-
"नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू, 
कालनिसा सम निसि ससि भानू।"
 कुबलय बिपिन कुंतबन सरिसा, 
बारिद तपत तेल जनु बरिसा ।। 
कहेछु तें कछु दुःख घटि होई, 
काहि कहाँ यह जान न कोई। 
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा, 
जानत प्रिया एकु मनु मोरा ।। 
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही, 
मगन प्रेम तन सुधि नहि तेही।"

"कहेउ राम बियोग तव सीता" ये भाषा हनुमानजी नहीं बोल सकते।

वर्षा होती है तब मुझे लगता है गरम तेल बरस रहा है।

"सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।" मैं मुँह खोल रहा हूँ पर भगवान बोल रहे हैं। जो संदेश देकर भगवान की याद दिला दे वही राम का दूत है।

तब जानकीजी ने कहा हनुमान मैं तुम्हें क्या दूँ?

"आसिष दीन्ही रामप्रिय जाना, 
होहु तात बल सील निधाना। 
अजर अमर गुननिधी सुत होहू, 
करहुँ बहुत रघुनायक पर छोहू।।"

भरत जी को और विभीषण को भी राम का संदेश देते हैं हनुमानजी।

लंका में रावण के पूछने पर संबंध बताया "मैं रामदूत हूँ।" हनुमानजी की पहली पहचान है रामदूत । दूत का काम है स्वामी का संदेश देना, उनका प्रभाव स्थापित करना। जिस दूत की वाणी से शांति मिले वही सच्चा दूत है। जो संसार की बातें करे वह कामदूत है, राम दूत नहीं।

"कपि तव दरस सकल दुख बीते"

हनुमानजी ने समझपूर्वक वानर देह धारण की है। नारद मोह प्रसंग में नादरजी ने भगवान को श्राप देते समय कहा, "आपने  मुझे वानर बनाया तो कठिनाई में वानर ही आपकी सहायता करेंगे। पृथ्वी पर राम अवतार लेने की प्रसंग आने पर ब्रह्माजी ने समस्त देवताओं को आज्ञा दी कि आप सब पृथ्वी पर जाओ और वानर रूप लेकर भगवान की सेवा करो। उस समय देवगुरु बृहस्पति जांबवान बने, वैद्यराज अश्विनी कुमार नल-नील बने, ग्यारहवें रूद्र स्वरूप शंकरजी हनुमानजी के रूप में पृथ्वी पर आए। शास्त्रों में दूसरे किसी भी वानर की पूजा का विधान नहीं है। वस्तुतः हनुमानजी की पूजा सदाशिव की ही पूजा है। कहा है :-

"जेहि शरीर रति राम सों, सोई आदरहीं सुजान।
 रुद्र देह तजि नेह बस, वानर भय हनुमान।।"

हनुमान जी प्रभु राम की दास भाव से सरलता से सेवा करते हैं। अध्यात्म रामायण के अनुसार भगवान राम पूछते हैं कि आप कौन हैं? तब ज्ञानगुण सागर हनुमानजी कहते हैं -

भौतिक दृष्टि से मैं आपका दास हूँ, आप मालिक हैं।
ऐहिक दृष्टि से मैं आपका अंश हूँ आप अंशी हो, ईश्वर हो।
- आध्यात्मिक दृष्टि से आप और मैं एक ही हैं। केवल आप ही उपस्थित हैं। मेरी कोई हस्ती नहीं।

प्रभुराम के संदेशवाहक बनकर हनुमानजी लंका में भक्तिरूपी सीताजी के पास जाते हैं तब परिचय देते हुए कहते हैं :
"रामदूत मैं मातु जानकी"
एक संत कहते हैं कि यदि हमें कोई पूछे कि आप कौन हैं तो हम अपना सम्बन्ध बता देते हैं। जो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हो फिर पत्नी प्रसिद्ध हो तो पत्नि का संबंध बता देते हैं।

अतुलित बलधामा - धाम कहते हैं निवास को ब्रज धाम, अयोध्या धाम, चित्रकूट धाम। हनुमान जी बल के धाम हैं। बल हनुमान का नहीं। किसी मकान में हथियार रखे हों तो वे मकान के नहीं रखने वाले के होते हैं। हनुमान जी कहते हैं मैं तो मकान हूँ भगवान का हूँ , बल तो भगवान का है मैं तो सिर्फ मकान हूँ धाम हूँ।

"अतुलित बलधामं हेम शैलाभ देहं"

भगवान का बल कैसा है? भगवान फूलों से सीता का श्रृंगार कर रहे हैं वन में सोने के आभूषण तो थे नहीं। भाव मुख्य होता है प्रेम में। उसी समय इन्द्र के पुत्र जयन्त ने कौएं का रूप लेकर चोंच मारी सीता के चरणों में। किसी की हँसती खिलती जिंदगी में चोंच मारे वह हंस नहीं कौआ ही हो सकता है। प्रायः बडे लोगों के बेटे जयंत जैसे होते हैं सींक का बाण बनाकर मारा जयंत को राम ने। किसी ने जयंत को आश्रय नहीं दिया। भगवान का बाण मारता नहीं पीछा करता है। काल भगवान का बाण है। न्यायालय दंड देता है क्षमा नहीं करता। नारद ने देखा -

"नारद देखा विकल जयंता, लागि दया कोमल चित संता।"

नारद ने कहा, जिसका अपराध किया है उसकी के पास जा। तूने तो छोटा सा अपराध किया है। उनकी पत्नि के चरणों में चोंच ही तो मारी है। मैंने तो उनकी पत्नि को ही ब्याहने का प्रयत्न किया था तो भी क्षमा कर दिया। जा भगवान को इतना कहना आपका प्रभाव देख लिया।

"अतुलित बल अतुलित प्रभताई, मैं मतिमंद जान नहीं पाई।"

भगवान कहाँ बैठे हैं? हनुमान जी के हृदय में। इसलिये हनुमान जी " अतुलित बल धाम है।" बल उन्हीं में दिखता है जो अपने आपको भगवान का सेवक समझकर भगवान का कार्य करता है। काम और राग छोड़कर अपने कर्त्तव्य में जो दृढ़ होता है - उसी का बल अतुलित होता है। हमें भी रामदूत बनना चाहिये। रामदूत के पास अतुलित बल होता है क्योंकि उसकी शक्ति के साथ राम की शक्ति खड़ी हो जाती है।

"जितने तारे गगन के, उतने शत्रु होय।
जो कृपा बरसे राम की, तो बाल न बांका होय ।।"

अतुलनीय शक्ति उसके पास आती है। गुजराती में एक संत कहते हैं।
"हूँ तने जोठं तो पछि, जोउं नहीं दुनियां में।
जो तू मने जुए तो, जुए आखी दुनिया मने।।"

लोग कहते हैं SUCCESS CAN NOT BE ACHIEVED WITHOUT STRESS। लेकिन बिना तनाव के सफलता पाने का सूत्र एक ही चौपाई में यहां, और गीता के एक ही श्लोक में दिया है। जो काम करेंगे उसका फल तो मिलेगा ही। मैं भगवान के लिए काम करता है तो मेरे गीता के एक ही श्लोक में दिया है। अपने आपको हमेशा नौकर समझो, मालिक नहीं। मैं भगवान के लिये काम करता हूं तो मेरे लिए जो अच्छा होगा वह देगा ही। कर्म करो लेकिन फल की चिन्ता मत करो। आपको जीवन में जो चाहिये वह आएगा ही। अपने आपको भगवान का सेवक समझो और सेवा करो। देने वाला वही है और वह देगा ही। इसलिये हनुमान जी को कभी टेंशन था ही नहीं। अपनी शक्ति से कार्य करो लेकिन अपने आपको भगवान का दूत मानो।

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा -

अंजनि बहुत तेजस्विनी थी। वे पूर्व जन्म में अप्सरा थी। आदम पर्वत पर घोर तप किया। पवन की उपासना की। पवन सबसे ताकतवर हैं। पवन देव ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि मेरे और शंकरजी के तेज से तुम्हें ऐसा बालक होगा जो तीनों लोकों में तेजस्वी होगा।

एक दिन माँ अंजनी श्रृंगार करके बगीचे में घूम रही थी  तो उन्हें लगा कि उन्हें कोई स्पर्श कर रहा है। तब उन्होंने कहा, "मुझे कौन छू रहा है? जो भी हो सामने आओ नहीं तो में श्राप दूंगी"। तब जवाब मिला, "मैं पवन देव हूँ। साक्षात शिवजी आपके द्वारा अवतार लेना चाहते हैं। मैंने मन से आपकी देह में उनके तेज को स्थापित कर दिया है इसलिए आपका पतिव्रत खंडित नहीं होगा।" इसलिए हनुमान जी अंजनीपुत्र और पवन तनय कहलाते हैं।

जब अंजना जी हनुमान जी को दूध पिलाती थी तो रामकथा ही सुनाती थी। अंजनी जी परम प्रतिव्रता थी। वे चाहे जब स्त्री रूप और चाहे जब वानरी का रूप ले सकती थी उनका विवाह केसरी नामक वानर के साथ हुआ था। केसरी भी चाहे जब नर और चाहे तब वानर रूप ले सकते थे। इन दोनों की विशेषता हनुमान जी को सहज रूप से मिली थी इसलिए वे प्रंसगोपात ब्राह्मण वेश धारण करते हैं।

नाथ संप्रदाय के ग्रन्थों के अनुसार हनुमान जी केशरीजी की पत्नि अंजनि के पुत्र हैं। दोनों ने पुत्र प्राप्ति हेतु मतंग ऋषि के मार्गदर्शन के अनुसार ऋष्यमूक पर्वत पर बारह वर्ष तक भगवान शिव की आराधना की। शिवजी ने प्रसन्न होकर वरदान देते हुए कहा, कल प्रातः तुम आंखें बन्द करके अंजलिबद्ध होकर सूर्य के सामने खड़े रहना। पवनदेव द्वारा तुम्हारी अंजलि में प्रसाद रखा जाएगा। उसे ग्रहण करने से अनंत ओजस्वी, तेजस्वी, अजर, अमर पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। ग्याहरवें रूद्र स्वयं तुम्हारे यहां पुत्र रूप में आएंगे।

उस समय राज दशरथ अयोध्या में पुत्र कामेष्टि यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की समाप्ति पर स्वयं अग्निदेव खीर का पात्र लेकर यज्ञ कुण्ड में प्रकट हुए। यह प्रसाद राजा ने तीनों रानियों को बांट दिया। उसी समय एक चील आई और कैकेयी के हाथ में रखे प्रसाद को लेकर उड़ गई और थोड़ी सी खीर कैकेयी जी के हाथ में रही। उस समय आंधी और तुफान जोर से आने के कारण चील की चोंच में जो खीर का भाग था वह अंजनी जी जहाँ हाथ फैलाकर खड़े थे उसमें आकर गिरा। उसे प्रसाद समझकर अंजनीजी ने ग्रहण किया। नौ महीने बाद चैत्र शुक्ल पूर्णिमा मंगलवार को सूर्योदय के समय वानर रूप में हनुमान जी का प्राकट्य हुआ। संत मत के अनुसार हनुमान जी का जन्म तुला राशि में हुआ इसलिए उनका मुख्य नाम 'रामदास' है। एक संत कहते हैं जन्म के समय हनुमान जी बहुत सुंदर थे इसलिए उनका नाम 'सुन्दर' रखा गया। तुलसीकृत रामचरित मानस में एक कांड में हनुमानजी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है अतः वह 'सुन्दरकाण्ड' कहलाता है।

हनुमान जी 'नामा' कहलाते हैं इसके पीछे पौराणिक कथा है -

राम राज्याभिषेक के समय सर्वेश्रेष्ठ हीरों का हार हनुमान जी को भेंट दिया गया तो हनुमान जी दांत से तोड़-तोड़कर हर हीरे देखने लगे तो किसी ने पूछा क्या देख रहे हो तो हनुमान जी ने कहा हीरे में राम नाम लिखा है या नहीं वह देखता हूँ। रामनाम नहीं लिखा हो तो ये हीरे तुम्हारे लिए अनमोल होंगे पर मेरे लिये उनकी कोई कीमत महीं। तो एक पूछने वाले ने व्यंग्य किया 'शरीर में कहाँ रामनाम लिखा है? तो उसे तुच्छ मान लें क्या?' यह सुनते ही हनुमान जी ने अपना अंग चीर कर रामनाम दिखा दिया। प्रत्येक श्वास प्रश्वास में उनके रोम-रोम में रामनाम गूंजता था इसलिये वे 'नामा' कहलाए।

अंजनी माता का ऐसा सौभाग्य है कि हनुमान जी जैसा बेटा आया। माँ कृतार्थ होती है उसकी सुगन्ध बढ़ जाती है। लंका से लौटते समय हनुमान जी भगवान श्री राम को माता अंजनी के पास (घर) लेकर आए। आजकल बेटे मां को घर से बाहर करने की सोचते हैं।
पवन सबकी सेवा करता है पर दिखाई नहीं देता। पवन यानि रूप रहित स्पर्शवान वायु पवन ने छिपकर काम किया। आजकल लोग स्टेज पर जाकर बैठना चाहते हैं। परन्तु हनुमान जी राम द्वार पर बैठे हैं।
"रामदूआरे तुम रखवारे"

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