हनम् अहंता इति हनुमंता।__चालीसा की महिमा
चौपाई _जय हनुमान ज्ञान गुण सागर,
जय कपीश तिहू लोक उजागर।। १ ।।
सरलार्थ_ श्री हनुमान जी आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अपार है। तीनों लोकों (पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल) में आपकी कीर्ति प्रकाशित है।
व्याख्या _ ज्ञान और गुणों के सागर हनुमान जी की जय जयकार व्यक्ति के अभिमान को दूर कर देती है।
हनम् अहंता इति हनुमंता। जो तत्व हमारे अहंकार का हनन करदे चूर चूर करदे वह हनुमान के नाम से पूजा जाता है।
हनुमान ज्ञान और गुण के सागर हैं। छोटे थे तब उन्हें कौनसे स्कूल में पढ़ाएँ। सूर्य सबसे तेज हैं। तो हनुमान जी उनके पास पहुँच गए। हनुमान जी ने कहा मुझे पढ़ाइये। सूर्य ने कहा मेरा तेज तुम सहन नहीं कर पाओगे तो सूर्य को मुहँ में रख लिया। सूर्य ने कहा मेरी गति तेज है और तुम दौड़ोगे तो मेरी तरफ पीठ करके दौड़ोगे, तो हनुमान जी ने कहा मैं आपकी तरफ मुँह करके दौडूंगा। चार दिन में ही सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया, वेदों का ज्ञान। तुलसी जी ने उनके ज्ञान और गुणों को सागर की उपमा दी है सागर की थाह नहीं पायी जा सकती उसी तरह हनुमान जी की गहराई भी नहीं नापी जा सकती है।
कोई व्यक्ति बुद्धिशील हो पर गुण सदन न हो तो वह ऐसा लगता है जैसे मुर्दे को रत्न-आभूषण रेशमी वस्त्र पहनकर इत्र छिड़क दिया तो भी किस काम का। गुण रहित ज्ञान की बातें ऐसी ही लगती है। ज्ञान दूध जैसा है उसे योग्य पात्र में रखना चाहिए। यदि दूध मनुष्य की खोपड़ी में पड़ा हो तो कोई नहीं पीएगा। कागज की प्लेट में वस्तु रह सकती है अग्नि नहीं। इसी तरह गुणहीन, आचरण हीन लोग ज्ञान विज्ञान की बाते भले ही करें परन्तु ज्ञान का प्रकाश उनमें नहीं ठहर सकता। ज्ञानी व्यक्ति गुणी न हो तो अहंकार आने में देर नहीं लगती। हनुमान जी में एक भी अवगुण नहीं है। वे राक्षसों को मारने के लिए क्रोध करते हैं वह भी प्रभु सेवा के एक भाग के रूप में ही है।
नियम है कि यदि एक छोटा सा भी दुर्गुण आ गया तो सारे दुर्गुण आ जाते हैं, और एक सद्गुण आ जाय तो सब गुण आ जाते हैं। एक दृष्टांत हैं- एक गांव में लड़की वाले लड़का देखने गए और लड़के वालों के पड़ोसी से पूछा तो पड़ोसी ने कहा लड़का वैसे तो ठीक है पर खांसी है उसे टी.बी. हो गई कारण कभी कभी पी लेता है
वो भी रोज रोज नहीं कभी कभी जुआं खेल लेता है तब पीता है।
इसी तरह सद्गुण भी एक के बाद दूसरा आ जाता है जैसे -
"समिटि समिटि जल भरहिं तलावा, जिमि सद्गुन सज्जन पहिं आवा।
जिमि सरिता सागर मुँह जाई, जद्यपि ताहि कामना नाहिं।
तिमि सुख संपति बिनहिं बुलाए, धरमसील पहिं जाहि सुहाई ।।"
'हनुमान' शब्द का अर्थ _ हन = मारकर, मान अभिमान। अभिमान को मारे वह हनुमान।
'ह '- ब्रह्मा का 'नु' - अर्चना का
'मा' - लक्ष्मी का. 'न' - पराक्रम का द्योतक है।
हनुमान जी ज्ञानिनां अग्रगण्यं है। ज्ञानी सही समय पर प्रकट होते हैं। तरु पल्लव मुँह रहा लुकाई, करई विचार करौ का भाई।'
हनुमान जी सेवक, राजदूत, नीतिज्ञ, विद्वान, रक्षक, वक्ता, गायक, नर्तक, बलवान, बुद्धिमान हैं। शास्त्रीय संगीत के तीन आचार्यों में से एक हनुमान जी हैं। दूसरे दो हैं शार्दूल और कहाल। 'संगीत पारिजात' हनुमान जी के संगीत-सिद्धांत पर आधारित है। वे प्रज्ञावान, धीर, वीर और राजनीति में निपुण हैं। उन्हें मानस शास्त्र, राजनीति, साहित्य, तत्वज्ञान आदि शास्त्रों का गहन ज्ञान है। वे ग्यारहवें व्याकरणकार और रूद्र के अंशावतार है।
एक संत कहते हैं जिसके विषय में कहना हो उसकी जयकार होनी चाहिये। हनुमान जी की जय हो यानि भक्ति की, सेवा की, समर्पण की जय। हनुमान प्रतीक हैं निष्ठा सेवा भक्ति के। और राम प्रतीक है चेतना के। हमारे जीवन की समर्पण और भक्ति की जय होनी चाहिये।
हनुमान का एक अर्थ है हनु यानि दाढ़ी और मान यानि मार लगी हो। इन्द्र ने वज्र चलाया तो दाढ़ी पर थोड़ी चोट लगी इसलिए उनका एक नाम हनुमान कहलाया।
हनुमान ज्ञान गुण सागर हैं। ज्ञान बहुत बड़ा सागर है किसी ने भी ज्ञान की परिसीमा को प्राप्त नहीं किया। सागर की सीमा नहीं होती। ज्ञान का रूपांतरण गुण में न हो तो ज्ञान का फायदा नहीं होता। ज्ञान हजम न हो तो जीवन बिगड़ता है और अन्न हजम न हो तो शरीर बिगडता है। ज्ञान का रूपांतरण कृति में होना चाहिये। ज्ञान जीवन दर्शन के लिये है. पांडित्य प्रदर्शन के लिए नहीं। नहीं तो वह बोझ हो जाता है। ज्ञान जीवन में उतरने पर बोझ नहीं होता, शक्ति का प्रवाह बहता है। सुकरात कहते हैं KNOWLEDGE IS VIRTUE कृष्ण ज्ञान का वर्णन करते समय गुणों की बात करते हैं। अमानित्वं, अदंभित्वं आदि। सांप के सिर पर मणि हो तो भी सांप की भंयकरता कम नहीं होती। यदि ज्ञानी चरित्रहीन है तो वह मणिधर सर्प जैसा है। ऐसे व्यक्ति के पास से ज्ञान भी नहीं लेना चाहिए।
एक संत कहते हैं हनुमान जी ने ब्राह्मण रूप धर कर थोड़े से शब्दों में श्री राम का परिचय पूछकर अपना परिचय दिया। तब राम ने स्वयं ही उनकी प्रशंसा की कि यह व्याकरण जानने वाला ज्ञानी है, मामूली ब्राह्मण नहीं। सफलता का सूत्र है ज्ञान के साथ गुण होना। ज्ञान और बल दोनों खूब हों और गुण न हो तो विनाश हो सकता है। गुण के साथ ही ज्ञान में सुंदरता, सफलता आती है।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर
कपीश सुग्रीव नहीं, वे तो व्यवस्था के कपीश हैं। बालि और सुग्रीव तो कपियों के राजा थे। वास्तव में कपीश हनुमान जी हैं। जामवन्त कहते हैं :
"राखे सकल कपिन्ह के प्राणा"
वानरों के प्राणों की रक्षा करने के कारण वे कपीश कहलाए।
तिहूँ लोक उजागर - सूर्य भक्षण लीला (सूर्य लोक), अहिरावण वध (पाताल में), पृथ्वी पर तो वे हैं ही।
वे अनन्त रूप लेकर ब्रह्माण्ड में भक्त जनों की रक्षा करते हैं। ब्रह्मलोक में देवता, स्वर्ग में गंधर्व और पृथ्वी पर भक्त उनका गुणगान करते हैं, अतः वे तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।
एक संत कहते हैं कपि अर्थात् 'क' पिबति इति कपि। क अर्थात् ब्रह्म सुख 'पि' अर्थात् पीते रहते हैं। जो ब्रह्मसुख को पीते रहते हैं। ब्रह्मज्ञानी को कपि कहते हैं। हनुमान जी रामभक्ति का रस पीते रहते हैं।
कपि का एक अर्थ है वानर। वानरों के ईश यानि कपीश। वानर का स्वभाव बहुत चंचल होता है। वानरों जैसे चंचल प्राणियों के स्वामी हनुमान जी ही हो सकते हैं। वानरों को सम्भालना बहुत मुश्किल है।
मानव मन भी मर्कट जैसा ही चंचल है। मानव मर्कट चेष्टा करता है। यदि हमारे मन को हनुमान जी जैसा बना लें तो हनुमान जी जैसी शक्ति प्राप्त होती है। मानव बंदर का ही सुधरा हुआ रूप है तो बंदर हमारे पितृ हुए। तो फिर बन्दर (हनुमान जी) की पूजा करने में क्या शर्म है?
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