चौपाई - प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया ।।८।।

चौपाई - प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, 
          राम लखन सीता मन बसिया ।।८।।

जहाँ जहाँ प्रभुराम की कथा होती है वहाँ वहाँ हनुमान जी अनंत रूप धारण करके जाते हैं और गुप्त रूप में रहकर राम चरित्र सुनते हैं वे कथा के रसिया हैं। कथा कान से सुनना एक बात है, ध्यान से सुनना दूसरी बात है। अनन्त बार कथा सुनने पर भी रसिक श्रोता है। वे कभी भी कथा से ऊबे नहीं।
कुछ लोग भोजन के, कुछ वस्त्र पहनने के, आभूषण के, संग्रह करने के, क्रिकेट के, नई नई कार के रसिया होते हैं। हनुमान जी प्रभु चरित्र सुनने के रसिया है।

हरि कथा ही कथा, और सब व्यर्थ की व्यथा।

तुलसी जी को कथा मंडप में ही हनुमान जी की प्राप्ति हुई है। हनुमान जी पराक्रमी, दक्ष, बल, प्रभाव, धैर्य, शौर्य, चतुरता, ज्ञान होते हुए भी अहं शून्य बनकर प्रभुराम के चरणों में वे दास भाव से बैठे हैं। 
हनुमान जी हमेशा रामसेवक बनकर राम काज करते हैं। उनके जीवन के तीन मुख्य कार्य है।
(1) अहर्निश जागृत रहकर निरभिमान पूर्वक राम कार्य करना। संस्कृति और सज्जनों की रक्षा करना।
 (2) राम कथा निरन्तर सुनना। उदात्त गुणों को आत्मसात करना।
 (3) जगजंजाल को छोड़कर सतत रामनाम मय रहना।

संसार में सब चाहते हैं कि प्रभु हमारे हृदय में निवास करें। देवता ऋषि मुनि मनुष्य सब सीताराम जी का ध्यान करते हैं उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। परन्तु राम लक्ष्मण और जानकीजी के मन में हनुमान जी का निरन्तर वास है। इससे अधिक हनुमान जी की दूसरी कौन सी महिमा हो सकती है।
 वे बड़भागी भक्त, दूत, सेवक और पुत्र है।

किसी के घर में बिना रोकटोक आना जाना करना कठिन काम है और किसी के दिल में स्थान पाना उससे कठिन है और यदि मिल भी जाय तो वहाँ टिके रहना तो असंभव होता है। कारण संसार में सतत निकट रहने वाले व्यक्ति में दोष दिखने लग जाते हैं। धीरे-धीरे वह मन से गिर जाता है। हनुमान जी सतत राम जी की सेवा में रहते हैं परन्तु समर्पण भाव, विनम्रता और प्रीति के सद्‌गुणों से उन्होंने प्रभुराम, सीता और लक्ष्मणजी को जीत लिया है।

एक संत कहते हैं, कान से सब सुनते हैं पर ध्यान से नहीं। ध्यान न हो तो सुन नहीं पाते। जो सफल होना चाहते हैं उन्हें चाहिये कि जो सफल हुए हैं उनके बारे में सुना करें और उसके साथ रहें। सबसे महान सफल हैं भगवान। भगवान हमारे अंदर कैसे आते हैं? कानों की खिड़की से। इसलिए कहा है "रसो वै सः"। हनुमान जी प्रभु चरित्र रस के साथ सुनते हैं। रसिक वही है जो TOTALY सुनता है। कानो से वक्ता की वाणी को पीता है। जब भी सुनें रस पूर्वक सुने। जहाँ जहाँ राम कथा होती है वहाँ हनुमान जी होते हैं।

एक संत कहते हैं, साथ में रहना और मन में बसना कठिन है। दूर से मन में बसना संभव हैं। प्रयाग के लोग त्रिवेणी में स्नान नहीं, घर के कुएं पर करते हैं। नजदीक आने पर भाव नहीं रहता।

अति परिचय से होत है, हानि बहु ही भाई।
मलयागिरी की भीलनी, चंदन देत जलाई ।।

हनुमान जी साथ रहते हुए भी राम लखन सीता जी के मन में बस गए। पति कैसा है पत्नि से पूछो, पिता कैसा है पुत्र से पूछो, गुरु कैसा है शिष्य से पूछो। करीब के आदमी का अभिप्राय सही होता है। क्योंकि वह उसे समग्र रूप में देखता है। दूर का व्यक्ति तो प्रासंगिक देखता है। रस पूर्वक सुनेंगे तो जीवन परिवर्तन होगा। कान में अच्छी बातें डालनी है। बैल का कान पकड़ने पर सही चलता है, पूंछ या पैर पकड़ने पर नहीं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अतुलित बलधामम्- श्री हनुमान चालीसा विवेचन

दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।।

अतुलित बलधामम्