चिंता हरण हनुमान चालीसा का चमत्कार

दोहा - बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार।
        बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ।।

शब्दार्थ - हे पवन कुमार मैं आपका स्मरण करता हूँ। मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल हैं। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे क्लेश और विकारों को हर लीजिए, दूर कर दीजिए।

भावार्थ - बुद्धिहीन साधन स्वयं को शरीर ही समझता है अतः जीव बुद्धिहीन है। स्वयं को शरीर मान लेना और आत्मस्वरूप की विस्मृति होना बुद्धिहीनता है। हनुमान जी आत्मज्ञान प्रदान करने में समर्थ है।

जिसके पास जो हो वर मांगने पर तुंरत मिल जाता है। इसलिए चालीसा की रचना के पहले ही गोस्वामी जी पवन पुत्र से बल, बुद्धि और विद्या मांग रहे हैं और क्लेश तथा विकार हर लेने को कह रहे हैं।

उपनिषद कहता है_ नापमात्मा बल हीनेन लभ्यः। निर्बल मनुष्य को अत्मसाक्षात्कार नहीं होता। शरीर में बल हो तो रोग परेशान नहीं करते। बुद्धि अर्थात् विचार शक्ति। बुद्धि न हो तो अच्छे-बुरे का विवेक नहीं होता। किसी भी निर्णय में बुद्धि प्रधान होती है। विद्या - अर्थात् ज्ञान विज्ञान ।

पंतजलि योग सूत्र के दूसरे अध्याय के तीसरे सूत्र में पांच प्रकार के क्लेशों का वर्णन है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा मृत्यु का भय। ये पांचों क्लेश जीव को संसार में जकड़ रखने वाले बंधन कहलाते हैं और अविद्या ही बाकी चार कलेशों की जननी है और सब दुखों का कारण है।

जो जन्म मरण के फेरे से मुक्त करा दे वही विद्या कहलाती है। "सा विद्या या विमुक्तये"। हनुमान जी से तुलसीजी बल मांगते हैं कारण हनुमान जी पवन पुत्र हैं। उनका बल भी पवन के समान है। 'पवनतनय बल पवन समाना'। तुलसी का उन्हें पवन कुमार के नाम से संबोधित करने के पीछे निश्चित हेतु है कि हे पवन कुमार जिस तरह आपने रावण के महलों का नाश किया, अग्नि रूप बनकर राक्षसों के वन को जला दिया उसी तरह मेरे क्लेश और विकारों को हर लो, उनका नाश कर दो।

तुलसी जी हनुमान जी से बुद्धि मांगते हैं कारण हनुमान जी 'बुद्धिमतां वरिष्ठ' है।
तुलसीजी उनसे विद्या मांगते हैं कारण हनुमान जी "ज्ञानिनामणग्रण्यम्" हैं अर्थात ज्ञानियों में  सबसे आगे ।

हनुमान जी आत्मज्ञान देने में समर्थ हैं। आत्मज्ञान जाग्रत होने पर चित्त शांत होता है और शांत बुद्धि योग्य निर्णय ले सकती है। मनोबल हो तो मानस रोग नहीं होते।

एक संत कहते हैं जो अपने आपको बुद्धिहीन मानता है, वहीं बुद्धिमान है।

मनुष्य थोडा सा ज्ञान आते ही मदोन्मत्त हो जाता है। लेकिन जब वह ज्ञानियों में बैठता  है तो सब मान उतर जाता है जैसे बुखार उतर जाता है। डिग्री का अर्थ सीमित ज्ञान है। -डिग्री मिलने का मतलब इसके अलावा में दूसरा नहीं जानता। जितना ज्ञानी, उतना नम्र होना चाहिये। पेड़ पर फल लगते हैं तब नीचे झुकता है। जितना नम्र भाव होता है उतनी ही उसकी पूजा होती है।

ऊँचा ऊँचा सब चले नीचा चले न कोई। 
जो नीचा होकर चले, उससे ऊँचा न कोई ।।

प्रार्थना की पहली सीढ़ी है नम्रता। बैंक से लोन लेने जाते हैं तब नम्रता के साथ और भगवान के पास जाएं तो अहंकार के साथ? पहली सीढ़ी है नमन और दूसरी है स्मरण। हम प्रार्थना करते हैं पर फल नहीं मिलता कारण हमें प्रार्थना करना नहीं आता। प्रभावी प्रार्थना का रहस्य है कर्म और भक्तिभाव।

प्रार्थना में मांगना नहीं है। प्रार्थना का तात्पर्य है हमारे में शक्ति नहीं है या कम - पड़ती है और कर्म से हम प्राप्त नहीं कर सकते। तब उसी से मांगना चाहिये जो हमें प्रेम से दे। उसी से मांगों जो हमारी झोली प्रेम से भर दे। मांगना है तो भगवान से ही मांगो। दुनिया से तो निष्कामता रखो। जगत में तो सब लेने वाले ही हैं। देने वाला तो बस एक परमात्मा ही है।

तीन प्रकार के गर्व हैं (अ) सुन्दरता का गर्व उम्र के साथ (ब) वित्त का गर्व धन के साथ चला जाता है। (स) बुद्धि का गर्व सबसे बड़ा है, वह मुश्किल से जाता है।

तनु जानिके यानि अपने को शरीर जानकर शरीर के आराम के लिये ही सब कुछ करते हैं वे बुद्धिहीन ही हैं।

तीसरी सीढ़ी प्रार्थना की कीर्तनम्। कीर्तन यानि महिमागान। जब इस किसी की बड़ाई करते हैं तो हमारा मन उसके सामने झुक जाता है। भगवान को खुशामद नहीं चाहिए पर प्रार्थना से हमारा मन झुकता है। हनुमान जी से नम्रता सीखनी है। कर्म करे और किसी को पता भी न चले, उसे नम्रता कहते हैं। धरती का लैंड रेवेन्यू टैक्स होता है, वाटर टैक्स होता है, हाँगकांग में स्पेस टैक्स है पर एयर टैक्स नहीं होता। हनुमान जी पवन पुत्र हैं। पवन दिनरात हमारी सेवा करते हैं फिर भी कोई अहंकार नहीं। पवन की कीमत अस्थमा होने पर मालूम पड़ती है। तुलसीदास ने अपनी प्रार्थना से हमें सिखाया कि प्रार्थना कैसे करनी चाहिये। नमन, स्मरण, कीर्तन करके अहंकार को निकाल प्रभु की मूर्ति मन में बिठाकर याचना करनी चाहिये। स्तुति के बाद ही मांगना चाहिये और उसी से मांगों जो दे सकता है। प्रयत्न करने के बाद भी कमी रहती है तो भगवान से ही मांगों जैसा तुलसी ने मांगा। बार-बार जीवन भर मांगते रहेंगे क्या? एक बार मांगने के बाद कुछ मांगना न पड़े ऐसा मांगो।

तीन बातें तुलसी दास जी ने मांगी है। "बल, बुद्धि, विद्या देहु मोहि।"

हम सफल क्यों नहीं होते क्योंकि हमारे पास शारीरिक और मानसिक बल नहीं होता और होता है तो बुद्धि नहीं होती। बुद्धि में सही विद्या (ज्ञान) न हो तो बुद्धि सही रास्ते पर नहीं चलेगी। बुद्धि को कार्य में लगाने का भी ज्ञान होना चाहिये। बल, बुद्धि और विद्या ये तीनों सफलता के आधार (Foundation of Success) हैं। इन तीनों से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।
याचन के बाद अर्पण होना चाहिये। लेते हैं तो कुछ देना भी चाहिये। जब तक अर्पण नहीं करते तब तक कुछ मिलता नहीं। तुलसीदास जी कहते हैं "हरहु कलेस विकार"। मेरे पास क्लेश यानि दुःख और विकार यानि मन को विचलित करने वाले बहुत हैं ये मैं आपको देता हूँ।

क्लेश पाँच प्रकार के होते हैं और विकार छः प्रकार के, जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर। ये हमें दुख देते हैं फिर भी हम इनको छोड़ते नहीं। तुलसीजी कहते हैं मुझमें ये क्लेश विकार देने की शक्ति भी नहीं है आप ही इन्हें हर लो।

हमारे गले में चैन होती है पर मन बैचेन होता है। हमारे पास सब सेट है, सोफा सेट, टी.वी.सेट पर व्यक्ति अपसेट है। राग द्वेष से भरा हुआ व्यक्ति कभी शांत नहीं होता। मन से क्लेश निकालना है।
कामना करती हूं कि हनुमान जी सब की पीड़ा, चिंता और कष्ट हरें।

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