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हिन्दूत्व मात्र एक धर्म नहीं, एक व्यापक विचारधारा है; जिसकी बाल्यावस्था
पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।
तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।
अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत्।
तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा।।
पुत्रस्य यः महत्तीर्थ पित्रोश्चरणपंकजम्।
अन्यतीर्थ तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः।।
इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम्।
पुत्रस्य च स्त्रीयाश्चैव तीर्थ गेहे सुशोभनम्।।
' जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है,  उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है।  जो माता-पिता को घर पर छोड़ कर तीर्थ यात्रा के लिए जाता है, वह माता- पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता- पिता के चरण सरोज ही महान तीर्थ है। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं, परंतु धर्म का साधन भूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है। पुत्र के लिए माता-पिता रूपी सुंदर तीर्थ घर में ही बुद्धिमान है।'
ये मानव मात्र को सिखाया है प्रथम पूज्य श्री गणेश ने।
ऐसे ही अगर एक और बालक का उदाहरण देखें
विष्णु भक्त ध्रुव
प्राचीन काल की बात है राजा उत्तानपाद के दो रानियां थी। एक रानी का नाम सुनीति और दूसरी रानी का नाम सुरुचि था। सुनीति बड़ी रानी और सुरुचि छोटी रानी थी। रानी सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव और रानी सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम था। राजा उत्तानपाद का रुझान छोटी रानी सुरुचि की तरफ ज्यादा था, क्योंकि वे  दिखने में काफी सुंदर थी। रानी सुरुचि अपनी सुंदरता पर काफी घमंड करती थी। वही बड़ी रानी सुनीति का स्वभाव सुरुचि से बिलकुल ही विपरीत था। वे काफी शांत और समझदार स्वभाव के थी। राजा का का सुरुचि की तरफ अधिक प्रेम देखते हुए रानी सुनीति दुखी रहती थी। इसीलिए वह अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त भगवान की पूजा अर्चना करते हुए बिताती थी। एक दिन सुनीति के पुत्र ध्रुव अचानक अपने पिता राजा उत्तानपाद की गोद में जाकर बैठ गए। वे अपने पिता के गोद में बैठ कर खेल रहे थे कि वहां उनकी छोटी रानी सुरुचि पहुंच गई, ध्रुव को राजा की गोद में देख,  गुस्सा हो कर रानी ने ध्रुव को राजा की गोद से नीचे उतारते हुए कहा कि तुम राजा की गोद में नहीं बैठ सकते, राजा की गोद और और सिंहासन पर सिर्फ मेरे पुत्र उत्तम का अधिकार है। यह सुनकर ध्रुव को बुरा लगा वे वहां से रोते हुए अपनी मां के पास चले गए । रानी सुनीति उनको रोने का कारण पूछने लगी ने रोते हुए सारी बात बताई।  ध्रुव की बात सुनकर मां की आंखों में आंसू आ गए, चुप कराते हुए कहा कि भगवान की आराधना में बहुत शक्ति है, अगर सच्चे मन से आराधना की जाए तो भगवान से तुम्हें  पिता की गोद और सिंहासन दोनों मिल सकते हैं।  मां की बात सुनकर ध्रुव ने निश्चय कर लिया कि वह सच्चे मन से भगवान की आराधना करेंगे।
ध्रुव अपने महल से भगवान की प्रार्थना करने जंगलों की तरफ निकल पड़े, उन्हें रास्ते में ऋषि नारद मिले छोटे से ध्रुव को जंगलों की तरफ जाता देख नारद ऋषि ने उन्हें रोका; नारद ने उनसे पूछा- तुम जंगलों की तरफ क्यों जा रहे हो ? ध्रुव ने उन्हें बताया कि भगवान का ध्यान करने जा रहे हैं। ध्रुव की बात सुनकर नारदजी ने समझाया, राजमहल वापस भेजने की कोशिश की। लेकिन ध्रुव ने उनकी एक न सुनी। उनके निर्णय को जानकर नारद ने उन्हें 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करने को कहा । इसके बाद वे जंगल में जाकर इस मंत्र का जाप करने लगे। उधर नारद ने महाराज उत्तानपाद को ध्रुव के बारे में बताया, बेटे के बारे में सुनकर महाराज का मन चिंतित हो गया। वे ध्रुव को वापस लाना चाहते थे, लेकिन ऋषि ने बताया कि ध्रुव प्रार्थना  में डूब गया और वापस नहीं आएगा। उधर कई दिन और महीने गुजर गए, ध्रुव प्रार्थना करते रहे। इसी बीच ध्रुव की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान हरि ध्रुव के सामने प्रकट हुए वरदान देते हुए कहा, ' तुम्हारी तपस्या से हम प्रसन्न है, तुम्हें राज सुख मिलेगा। साथ ही तुम्हारा नाम और तुम्हारी भक्ति हमेशा के लिए जानी जाएगी।'  यह सुनकर ध्रुव बहुत खुश हुए और उन्हें प्रणाम कर राज महल की तरफ चले गए । राजा उत्तानपाद ने उनको अपना पूरा राज्य सौंप दिया। भगवान के वरदान से भक्त का नाम अमर हो गया और आज भी उन्हें आसमान में सबसे ज्यादा चमकने वाले तारे के नाम से जाना जाता है।
(यही तो है हिंदू धर्म और हिंदुत्व)
इस प्रकार एक अन्य उदाहरण देकर बालक नचिकेता का... अपने पिता के मान सम्मान और उनकी आज्ञा को मानते हुए नचिकेता यमराज से मिले और यमराज को अपनी बातों से अपने ज्ञान से खुश कर दिया। जब यमराज ने उन्हें तीन वर मांगने को कहा नचिकेता ने अपने पिता के प्रति भक्ति मांगी, दूसरी बार में नचिकेता ने पृथ्वी पर बहुत से दुख है और दुख दूर करने का उपाय क्या हो सकता है ? इसका जवाब यमराज से मांगा यमराज ने उसको विद्या सिखाई और ज्ञान दिया । तीसरे वरदान में नचिकेता ने अपने लिए कोई सुख नहीं मांगते हुए, अपने प्रश्नों के उत्तर मांगे उनके प्रश्न थे, मृत्यु क्यों होती है? मृत्यु के बाद मनुष्य का क्या होता है? वह कहां जाता है? इसकी शिक्षा और विद्या भी नचिकेता ने यमराज से ग्रहण की।  छोटा सा बालक, जो बड़े-बड़े पंडित ज्ञानी विद्वान भी ना जान सके,  वह विद्यााा जान गया।
ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, अगले क्रम में हम जानेंगे, बालक ऋषि मार्कण्डेय के बारे में, जिनकी 16 वर्ष की आयु में ही स्वयं भगवान शिव ने तय कर दी थी। कैसे उन्होंने महाकाल को प्रसन्न कर उनसे अमरत्व का वरदान प्राप्त किया और जानेंगे परमज्ञानी अष्टावक्र के बारे में।
जय हिन्दु जय हिन्दुत्व।।

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